अफगानिस्तान में शांति से तुर्की का क्या कनेक्शन? क्या फिर इस्लामिक देशों का मसीहा बनना चाहते हैं एर्दोगन

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हाइलाइट्स:

  • अफगानिस्तान शांति वार्ता को लेकर ऐक्टिव हुआ तुर्की, बुला रहा बड़ा सम्मेलन
  • तुर्की ने अफगानिस्तान, तालिबान, यूएन और कतर को बैठक में बुलाया
  • इस्लामिक देशों का नेता बनना चाहते हैं राष्ट्रपति एर्दोगन, पाकिस्तान की मदद है लक्ष्य

अंकारा
अफगानिस्तान में शांति को लेकर अब तुर्की ने तालिबान समेत विभिन्न पक्षों के बीच वार्ता कराने का ऐलान किया है। यह शांति वार्ता 24 अप्रैल से 4 मई तक इस्तांबुल में आयोजित की जाएगी। तुर्की ने इसमें हिस्सा लेने के लिए अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के अलावा संयुक्त राष्ट्र और कतर के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया है। अंदरखाने यह भी रिपोर्ट आ रही है कि तुर्की चाहता है कि इसमें भारत और पाकिस्तान भी भागीदारी करें, लेकिन अभी तक नई दिल्ली की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है।

अफगानिस्तान मुद्दे पर एर्दोगन ने इमरान को किया फोन
उधर, गुरुवार को तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को फोन कर अफगानिस्तान के मुद्दे पर बातचीत की। पाकिस्तानी विदेश विभाग ने बताया कि दोनों नेताओं के बीच अफगान शांति प्रक्रिया, पाकिस्तान-तुर्की संबंधों को और मजबूत करने के अलावा कई द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई। इस दौरान इमरान खान ने भी तुर्की की भूमिका की सराहना करते हुए अफगानिस्तान मुद्दे का हल किए जाने पर जोर दिया। इमरान और एर्दोगन के बीच बातचीत से यह तो साफ हो रहा है कि दोनों ही देश एक दूसरे के सहारे अफगानिस्तान में अपनी भूमिका को बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।

अफगानिस्तान में शांति से तुर्की का क्या संबंध?
अफगानिस्तान को लेकर तुर्की की अतिसक्रियता कई सवाल खड़े करती है। लगभग 3000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक देश में शांति को लेकर जब पहले से ही बातचीत जारी है तो तुर्की अलग से बैठक क्यों बुला रहा है? दुनिया की दो महाशक्तियां अमेरिका और रूस भी अलग-अलग चैनलों के माध्यम से अफगानिस्तान में शांति बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

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क्या मुस्लिम देशों का मसीहा बनना चाहते हैं एर्दोगन
तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन शुरू से ही अपनी कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा के लिए जाने जाते हैं। दुनिया में कहीं भी इस्लाम को लेकर कोई विवाद होता है तो उनकी पूरी कोशिश होती है कि वे जरूर उसमें शामिल हों। बस, चीन के उइगुर मुस्लिमों का ही मुद्दा ऐसा है, जिसमें एर्दोगन के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता है। हाल में ही जब फ्रांस में मोहम्मद साहब का विवादित कार्टून प्रकाशित किया गया था, तब दुनिया में अगर किसी बड़े राजनेता ने सबसे अधिक हल्ला मचाया था तो वह एर्दोगन ही थे। उन्होंने तो फ्रांसीसी राजदूत तक को अपने देश से निकाल दिया था।

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आंख बंद कर एक दूसरे का समर्थन करते हैं तुर्की-पाकिस्तान
तुर्की और पाकिस्तान केवल रक्षा संबंधों में ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी एक दूसरे का आंख बंदकर समर्थन करते हैं। हाल में ही जब ग्रीस के साथ भूमध्य सागर में सीमा विवाद हुआ तो पाकिस्तान ने बिना सच्चाई जाने खुलेआम तुर्की के पक्ष में समर्थन का ऐलान किया था। इतना ही नहीं, भूमध्य सागर में पाकिस्तान और तुर्की की नौसेनाओं ने युद्धाभ्यास कर एकजुटता का ऐलान भी किया। इसके बदले में तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का खुला समर्थन करता है। एर्दोगन ने फरवरी 2020 में कहा कि यह मुद्दा तुर्की के लिए उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि पाकिस्तान के लिए।

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एर्दोगन संयुक्त राष्ट्र में कई बार कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना कर चुके हैं। पिछले साल सितंबर महीने में एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कश्मीर राग छेड़ा था। उन्होंने कहा था कि कश्मीर एक ज्वलंत मुद्दा है और दक्षिण एशिया में शांति और स्थि‍रता के लिए बेहद अहम है। जम्मू कश्मीर के स्पेशल स्टेटस (अनुच्छेद 370) को हटाए जाने के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई है। हम इस समस्या का संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत हल चाहते हैं। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान पाकिस्तान की तारीफ भी की थी।

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अतातुर्क के मूल्यों को बदल रहे एर्दोगन?
तुर्की रिपब्लिक की नींव रखने वाले मुस्तफा कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफा कमाल पाशा ने धर्म को खत्म करते हुए यूरोप से प्रेरणा लेना शुरू किया था। इस्लामिक कानून (शरिया) की जगह यूरोपीय सिविल कोड्स आ गए, संविधान में धर्मनिरपेक्षता को शामिल किया गया, समाज में महिला-पुरुष को एक करने की कोशिश की और एक मुस्लिम बहुल देश की शक्ल बदल दी। हालांकि, देश में डेढ़ दशक से ज्यादा सत्ता में रहने वाले राष्ट्रपति एर्दोगन ने धीरे-धीरे अतातुर्क के एक मुस्लिम लोकतंत्र के आदर्श देश को बदलना शुरू कर दिया।

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भूमध्य सागर पर कब्जा करने का सपना देख रहे एर्दोगन
एर्दोगन भूमध्य सागर के गैस और तेल से भरे क्षेत्र पर तुर्की का कब्जा करना चाहते हैं। इसलिए आए दिन तुर्की के समुद्री तेल खोजी शिप कभी ग्रीस तो कभी साइप्रस के जलसीमा में घुस रहे हैं। इसी को लेकर ग्रीस और तुर्की में तनाव इतना बढ़ गया था कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच जंग के हालात बन गए थे। वहीं, फ्रांस समेत यूरोपीय यूनियन के कई देश ग्रीस का समर्थन भी कर रहे हैं।


भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना तुर्की
तुर्की अब पाकिस्तान के बाद ‘भारत-विरोधी गतिविधियों’ का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केरल और कश्मीर समेत देश के तमाम हिस्सों में कट्टर इस्लामी संगठनों को तुर्की से फंड मिल रहा है। एक सीनियर गवर्नमेंट अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि तुर्की भारत में मुसलमानों में कट्टरता घोलने और चरमपंथियों की भर्तियों की कोशिश कर रहा है। उसकी यह कोशिश दक्षिण एशियाई मुस्लिमों पर अपने प्रभाव के विस्तार की कोशिश है।



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