इजरायल में पुरातत्‍वविदों को मिला 6500 साल पुराना ‘खजाना’, बदलेगा दुनिया का इतिहास

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हाइलाइट्स:

  • इजरायल के पुरातत्‍वविदों के हाथ 6500 साल पुराना इंसान का अनमोल ‘खजाना’ हाथ लगा है
  • इजरायल के पुरातत्‍वविदों को देश के रेगिस्‍तानी इलाके में दुनिया की पहली भट्ठी के साक्ष्‍य मिले हैं
  • उन्‍होंने दावा किया है कि इस भट्ठी में इस्‍तेमाल की गई तकनीक दुनिया में सबसे ज्‍यादा परिष्‍कृत थी

तेल अवीव
इजरायल के पुरातत्‍वविदों के हाथ 6500 साल पुराना इंसान का अनमोल ‘खजाना’ हाथ लगा है। इस ‘खजाने’ से पूरी दुनिया का इतिहास बदलना पड़ सकता है। दरअसल, इजरायल के पुरातत्‍वविदों को दुनिया की पहली भट्ठी के साक्ष्‍य मिले हैं। उन्‍होंने दावा किया है कि इस भट्ठी में इस्‍तेमाल की गई तकनीक इतनी परिष्‍कृत थी जितना कि प्राचीन काल में पूरी दुनिया में कहीं नहीं था।

यह भट्ठी इजरालय के नेगेव रेगिस्‍तान के दक्षिण में स्थित बीर शेवा में तीन साल तक चले अध्‍ययन के बाद मिली है। वर्ष 2017 में से चल रही खुदाई में यह भट्ठी म‍िली। माना जा रहा है कि इस भट्ठी में तांबे को गलाया जाता था। तेल अवीव यूनिवर्सिटी और इजरायल के पुरातत्‍व विभाग के शोधकर्ताओं के मुताबिक यह स्‍थल दुनिया की पहली भट्ठी के लिए इस्‍तेमाल किया जाता था।

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ताम्र पाषाणकालीन कालीन उपकरण उत्‍पादन स्‍थल
इजरायली अधिकारी तलिया अबूलफिया ने कहा, ‘खुदाई से मिले सबूतों से खुलासा हुआ है कि यह ताम्र पाषाणकालीन कालीन (6500 साल पहले) उत्‍पादन स्‍थल था। आश्‍चर्यजनक खोजों में एक छोटी वर्कशॉप मिली है जिसमें भट्ठी के अंदर तांबे को गलाए जाने के सबूत मिले हैं। इसके अलावा तांबे के बडे़ पैमाने पर तलछट (कॉपर स्‍लैग) मिले हैं।’ ताम्रपाषाणिक या कॉपर एज को चौथी से तीसरी शताब्‍दी ईसापूर्व के बीच माना जाता है।

इजरायल में म‍िला वर्कशॉप

ताम्रपाषाणिक काल में कॉपर के उपकरणों के निर्माण के साक्ष्‍य मिले हैं लेकिन इसे अभी भी नियोलिथिक‍ या स्‍टोन एज का माना जा रहा है। इस काल के दौरान बनाए गए ज्‍यादातर उपकरण पत्‍थर से बने हैं। कॉपर के आइसोटोप के विश्‍लेषण से पता चला है कि उसे वादी फयनान जिसे आज जॉर्डन के नाम से जाना जाता है, से लाया गया था। यह इजरायली पुरास्‍थल से करीब 100 किमी दूर है।

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100 किमी दूर गलाने के लिए ले जाया जाता था कॉपर
इस पूरे शोध से यह चौंका देने वाला खुलासा यह हुआ है कि कॉपर को जहां से निकाला जाता था, उसे वहां से 100 किमी दूर गलाकर उपकरण बनाए जाते थे। आमतौर पर भट्ठियों को खान के पास ही बनाया जाता था लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कॉपर को इतनी दूर गलाए जाने का मकसद अपनी तकनीक को छिपाना हो सकता है।

तेलअवीव यूनिवर्सिटी के प्रफेसर बेन योसेफ ने कहा कि कॉपर को निकालना उस समय एक अनमोल तकनीक थी। इस तरह की उन्‍नत तकनीक प्राचीन काल में पूरी दुनिया में कहीं नहीं थी। उन्‍होंने कहा क‍ि इससे यह भी संकेत मिलता है कि संभवत: भट्ठी का आविष्‍कार इसी इलाके में हुआ हो। यह भी संभव है कि इस इलाके कुछ खास लोगों को ही धातुओं को पिघलाकर उपकरण बनाने की जानकारी हो। उन्‍होंने कहा कि इस इलाके ने दुनिया में मेटल क्रांति लाने में बड़ी भूमिका निभाई होगी।



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