इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में पक रहे खयाली पुलाव

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लेखकः भरत झुनझुनवाला
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ख़ुशी जताई है कि देश में मोबाइल फोन उत्पादकों की जो संख्या पांच वर्ष पूर्व मात्र दो थी, वह वर्तमान में बढ़कर 60 हो गई है। सचिव अजय प्रकाश शौनी ने कहा कि आज भारत में बिकने वाले 90 प्रतिशत मोबाइल फोन देश में ही बन रहे हैं। ये उत्साहवर्धक वक्तव्य हैं। साथ ही लगातार खबरें छपती हैं कि विदेशी निवेशकों ने इतने अरब डॉलर के निवेश के प्रस्ताव दिए हैं। ध्यान रहे, अगस्त 2015 में इसी प्रकार कहा गया था कि अमुक-अमुक कंपनियों द्वारा भारत में 17 अरब डॉलर के विदेशी निवेश के प्रस्ताव सरकार को दिए गए हैं। विश्व के प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक गुड्स निर्माता भारत में उस समय भी उपस्थित थे। फॉक्सकॉन और लेनोवो आंध्र प्रदेश के श्रीसिटी और तमिलनाडु के श्रीपेरंबदुर में फोन दूसरे ठेकेदारों से बनवा रहे थे। सैमसंग स्वयं नोएडा में उत्पादन कर रहा था। प्रश्न है कि जब ये कंपनियां भारत में 2016 में ही उपस्थित थीं तो आज तक इन्होंने अपने उत्पादन का विस्तार क्यों नहीं किया?

बंद पड़ा प्लांट
विशेष यह कि लेनोवो की सहायक कंपनी मोटोरेला का एक उत्पादन प्लांट चेन्नै में बंद पड़ा है। यानी नया निवेश तो बाद की बात है, पूर्व में किए गए निवेश को भी लेनोवो दोबारा उत्पादन में लाने को राजी नहीं है। उद्योगों के महासंघ ऐसोचैम ने बताया है कि भारत में जो मोबाइल फोन उत्पादित हो रहे हैं उनके पुर्जे वास्तव में विदेशों से आयात किए जा रहे हैं और उनकी केवल असेंबलिंग भारत में की जा रही है। जिस प्रकार गृहणी बाजार से बना-बनाया पिज्जा लाकर गर्म कर के परोस दे, उसी प्रकार भारतीय मोबाइल निर्माता पुर्जे आयात कर भारत में असेंबल करके बेच रहे हैं। इस असेंबलिंग को उत्पादन मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स के विश्व बाजार में हम फिसड्डी बने हुए हैं। वर्ष 2018-19 में भारत द्वारा 55 अरब डॉलर का आयात किया गया था जबकि निर्यात केवल 9 अरब डॉलर का था। सच यह है कि 2016 के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के बाद हमने इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं की है।

मैंने इंटरनेट पर इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के संबंध में आठ वेब पेजों का अध्ययन किया। इनमें छह ने कहा कि मूल समस्या स्किल्ड कर्मियों की है। उद्यमी को कुशल कारीगर उपलब्ध नहीं होते हैं। हमारे कॉलेजों में इलेक्ट्रॉनिक्स से संबंधित शिक्षा रटंत विद्या जैसी ही है। अध्यापकों को स्वयं इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन का ज्ञान नहीं है। इसलिए ग्रैजुएट भी उन्हीं की तरह अज्ञानी होते हैं। आठ में से दो विश्लेषकों का मानना था कि सरकारी अवरोध की समस्या है। बेंगलुरु के एक उद्यमी ने बताया कि हाल में सरकार ने एक नया नियम बना दिया है कि निर्यात के हर कन्साइनमेंट के साथ चार्टर्ड अकाउंटेंट का प्रमाणपत्र लगाया जाए। सरकार द्वारा निर्यात सरल करने के स्थान पर अवरोध पैदा किए जा रहे हैं। भारत की फिसड्डी स्थिति के अन्य कारण कानूनी पेच, पूंजी की कीमत, टैक्स की दर, भूमि और बिजली के मूल्य बताए गए जो कि मेरी समझ से प्रभावी कारण नहीं हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में सरकार ने नए कारखाने लगाने के लिए 50 से 75 प्रतिशत की पूंजी लागत में अनुदान देने की पहल की है, जो सराहनीय है। लेकिन यह भूख से मरते व्यक्ति को भोजन के स्थान पर ऑक्सीजन देने के समान है। जैसा ऊपर बताया गया है, मूल समस्या हमारी शिक्षा व्यवस्था और सरकारी अवरोधों की है। उसको हल किए बगैर यदि केवल पूंजी पर सब्सिडी देंगे तो इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग नहीं पनपेगा। संभवत: हम विश्व बैंक की गलत सलाह से प्रभावित हुए हैं। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुराष्ट्रीय संस्थाओं पर विकसित देशों की सरकारों का वर्चस्व है और इन सरकारों पर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है। ये कंपनियां नहीं चाहती हैं कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन हो। इसलिए विश्व बैंक ने सलाह दी है कि भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स में आगे आने के लिए आयात कर में कटौती करनी होगी और विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना सरल बनाना होगा।

लेकिन विश्व बैंक द्वारा ही प्रकाशित वर्ल्ड डिवेलपमेंट रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से 2008 के बीच विश्व उत्पादन में अंतर्देशीय व्यापार का हिस्सा 43 प्रतिशत से बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया था। 2008 के वैश्विक संकट के बाद इसमें गिरावट आ रही है और 2015 तक यह घटकर 45 प्रतिशत रह गया है। वर्तमान कोविड संकट के कारण निश्चित रूप से अंतर्देशीय व्यापार में पुनः भारी गिरावट आएगी। इसलिए जरूरी है कि सरकार निर्यातों और विदेशी निवेशकों के भरोसे भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को बढ़ावा देने की विश्व बैंक की सलाह से बचकर घरेलू उद्यमियों को प्रोत्साहित करे। जब अपने देश की ही पूंजी देश से पलायन कर रही है तब विदेशी पूंजी क्योंकर भारत आएगी? गांव के युवा शहर को भाग रहे हों तो शहर के प्रवासियों को गांव में बसाने की बात करना जुबानी जमाखर्च ही है।

शिक्षा की क्वॉलिटी
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का विस्तार करना है तो पूंजी सब्सिडी देने के स्थान पर अर्थव्यवस्था की जो मौलिक समस्याएं हैं उन पर ध्यान देना चाहिए। पहली समस्या शिक्षा की है। यहां सरकारी टीचरों को एक तो खुद व्यावहारिक ज्ञान नहीं है, दूसरे उनका वेतन सुरक्षित है। इन दोनों वजहों से वे पढ़ाने में रुचि नहीं लेते। इसके अलावा सरकारी यूनिवर्सिटियों में एजुकेशन फी काफी कम होने के कारण प्राइवेट संस्थान भी उत्तम श्रेणी के अध्यापक नियुक्त करने में असमर्थ हैं। जाहिर है, ऐसे में सरकार को सरकारी शिक्षा तंत्र के सुधार पर पैनी निगाह डालनी होगी। दूसरे, देश के सामाजिक और पर्यावरणीय वातावरण को सुधारना होगा क्योंकि विदेशी निवेशक उसी देश में निवेश की पहल करेंगे जहां उन्हें सुकून हो। वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के विस्तार की जो चर्चा हो रही है, वह निश्चित रूप से खयाली पुलाव साबित होगी। देश की अर्थव्यवस्था की मूल विसंगतियों का समाधान करना ही होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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