इस तकनीकी क्रांति में आगे निकल जाना है

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लेखकः बालेन्दु शर्मा दाधीच
भारत के सामने करीब-करीब उसी तरह का अवसर मौजूद है, जैसा आज से दो-तीन दशक पहले चीन के सामने मौजूद था। उस मौके का पूरा फायदा उठाकर चीन ने अपना कायाकल्प कर लिया और दुनिया का ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बन गया। अभी भारत दुनिया का ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ हब बन सकता है। इस हफ्ते भारत सरकार के सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग की तरफ से आयोजित रेज-2020 नाम से एक विशाल वैश्विक सम्मेलन हुआ जिसमें सैकड़ों विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और लाखों लोगों ने उसे ऑनलाइन देखा। हालांकि इसका थीम ‘सामाजिक रूप से उत्तरदायी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ था, लेकिन ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि क्या भारत दुनिया में पैदा हो रहे इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाकर सामाजिक-आर्थिक तरक्की की नई ऊंचाई हासिल कर सकता है।

खुशी और डर
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का मतलब मशीनों (या प्रौद्योगिकी) के भीतर इंसानों जैसी ही सीखने, विश्लेषण करने, सोचने, किसी बात को समझने, समस्याओं का समाधान करने, निर्णय लेने आदि की क्षमताएं पैदा हो जाने से है। जब मशीनें इंसान जैसी क्षमताएं पा जाएं तो खुशी भी होती है और डर भी लगता है। खुशी यह कि हमारे पास ऐसी मशीनें होंगी जो अनगिनत इंसानों के बराबर काम कर डालेंगी, वह भी बेहतर क्वॉलिटी के साथ। डर इस बात का, कि फिर इंसान का क्या होगा? वह क्या करेगा और कैसे कमाएगा-खाएगा? सबसे बड़ी बात यह कि सोचने-समझने में और अपना काम खुद करने में सक्षम मशीनें सदा-सदा तक इंसान के काबू में बनी रहेंगी, इस बात की क्या गारंटी है। उनमें से इक्का-दुक्का ने भी कोई बड़ा कारनामा कर दिखाया (जैसे कहीं बम गिरा देना या किसी प्रणाली को ध्वस्त कर देना आदि) तो हमारा और इस दुनिया का क्या बनेगा।

दिल्ली में वर्चुअल सम्मेलन रेज में 2020 को संबोधित करते पीएम मोदी

बहरहाल, इतना तो तय है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की वजह से हम ऐसी मशीनें और प्रणालियां बना लेंगे जो इंसान का काम आसान कर देंगी। सारे काम तेज रफ़्तार के साथ तथा बेहतर ढंग से करेंगी। ये संसाधनों पर होने वाले खर्च को बहुत कम कर देंगी और कारोबारी फायदे को बहुत बढ़ा देंगी। जैसे, इंसानों द्वारा चलाई जाने वाली एक फैक्टरी में रोजाना एक हजार स्कूटर बनते हैं लेकिन अगर वही फैक्टरी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा चलाई गई तो शायद वहां इससे दस गुना स्कूटर बनने लगें और कामगारों का खर्च घटकर दसवें हिस्से पर आ जाए, यानी 10% प्रतिशत खर्च पर 1000% परिणाम। मैं जानता हूं कि आपके मन में क्या सवाल आएगा। वह यह कि हमारा देश तो कामगारों और किसानों का देश है। अगर इसी तरह कामगार बेरोजगार होते रहे तो फिर बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी कि देश की अर्थव्यवस्था वैसे ही डूब जाएगी।

आपका डर अनुचित नहीं है लेकिन अब इस हफ्ते के सम्मेलन पर लौटते हैं, जिससे बात थोड़ी स्पष्ट हो जाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम भारत को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का ग्लोबल हब बनाना चाहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सिर्फ अपने यहां ऐसी मशीनों, तकनीकों, सेवाओं और उत्पादों का प्रयोग करने तक सीमित नहीं रहेंगे। हम उनका निर्माण और विकास पूरी दुनिया के लिए करेंगे। यह हमारे लिए उतनी ही बड़ी मजबूती बन सकता है जितनी चीन ने मैन्युफैक्चरिंग में हासिल की। चीन की ही तरह भारत में भी श्रम सस्ता है। लेकिन चीन के विपरीत, भारत बेहतर गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। आज चीन जिस तरह से छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी चीज का विनिर्माण कर रहा है, उसी तरह अगर हम आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अपना दबदबा बना लें तो क्या हमारा आर्थिक कायाकल्प नहीं हो जाएगा?

हमें याद करना होगा कि इनफोसिस के पूर्व सीईओ विशाल सिक्का ने क्या कहा है। उन्होंने कहा कि अगले 20 से 25 साल के भीतर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस भारत में बहुत बड़ी खलबली पैदा करने की क्षमता रखती है। आज ऑटोमेशन के कारण लोग जिस तरह से नौकरियां खो रहे हैं वह तो उस समय के मुकाबले कुछ भी नहीं है। लेकिन चूंकि हमारे पास समय है, हम अपने आपको उन हालात के लिए तैयार कर सकते हैं। अगर हम आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को अपनी शिक्षा प्रणाली के साथ इस तरह जोड़ लें कि बहुत बड़ी संख्या में इस काम में कुशल पेशेवरों को तैयार कर सकें तो फिर पासा पलट सकता है।

इसकी बड़ी वजह यह है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में जितनी विशाल संभावनाएं हैं, उस मुकाबले में मेधावी और कुशल लोग उपलब्ध नहीं हैं। इस मामले में भारत बड़े लाभ की स्थिति में है। दुनिया में स्टेम (साइंस, टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में ग्रैजुएट पैदा करने वाले देशों में भारत सबसे अग्रणी है। उपरोक्त सम्मेलन में जिस सत्र का संचालन मैंने किया उसमें यह निष्कर्ष निकल कर आया कि भारत में कुशल पेशेवरों की उपलब्धता, डेटा की प्रचुरता, कनेक्टिविटी की सुगमता, युवा पीढ़ी की बहुत बड़ी संख्या, सरकार के जोश और भारत के प्रति दुनिया के भरोसे के कारण हम वाकई छलांग लगा जाने की स्थिति में हैं।

बड़े कदम की दरकार
हालांकि चुनौतियां भी बहुत सारी हैं। जैसे यह कि हमारे स्कूल कॉलेजों में शिक्षा का स्तर क्या उतना उन्नत है, जितना इसे होना चाहिए? फिलहाल आर्टिफिशल इंटेलिजेंस में नौकरियों की कमी होने के कारण युवकों को आकर्षित करना मुश्किल है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर बड़ी पहल करने के लिए माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फेसबुक स्तर के जैसे विशाल संस्थान हमें चाहिए, उन्हें पैदा करने में हमारा रेकॉर्ड अधिक अच्छा नहीं है। फिर भी भारत में संभावनाएं हैं कि अगर वह आज बड़ा कदम उठा लेता है तो बीस-पचीस साल बाद जब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस हमारे जन-जीवन, कारोबार, सरकारी कामकाज, सेवाओं, उपकरणों आदि में दबदबा जमा चुकी होगी तो उनमें से बहुतों में लिखा होगा- मेड इन इंडिया, प्रॉसेस्ड इन इंडिया या फिर पावर्ड बाई इंडिया। यह ऐतिहासिक मौका है। इसे पकड़ लें या गंवा दें, हमीं को निर्णय करना है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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