किसान आंदोलनः बड़ा नुकसान करा देंगी छोटी गलतफहमियां

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लेखकः वरुण गांधी
राजधानी दिल्ली के हरियाणा से लगते 5 प्रमुख सीमा क्षेत्रों में धरना देकर लगभग 3,00,000 किसानों ने दिल्ली की घेराबंदी कर दी है। किसान हाल में बनाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनके बारे में विपक्ष का दावा है कि इनके लागू होने से वे बड़ी कंपनियों के रहमो-करम पर होंगे। सरकार ने सहानुभूति के साथ प्रतिक्रिया दी और बातचीत की पेशकश की। लेकिन विपक्ष ने नकारात्मक भूमिका निभाते हुए ऐसे सुधारों की असल मंशा पर किसानों को गलत जानकारी दी। इसने अनुचित मांगों को जन्म दिया है। कृषि को भारतीय राजनीति में बदलाव का सबसे मुश्किल क्षेत्र कहा जाता है। संविधान में इसको राज्य विषयों की सूची के अंतर्गत रखा गया और मार्केटिंग व्यवस्था में सुधार राज्यों में चलताऊ तरीके से किया जा रहा है।

साहसिक कदम
इस मामले में प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए एक साहसिक कदम उठाया है। आइए, केंद्र सरकार द्वारा पेश और संसद द्वारा पारित ‘कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020’ के प्रावधानों पर विचार करते हैं। इसकी धारा 4 में कहा गया है, ‘कोई भी व्यापारी एक से दूसरे राज्य में या राज्य के अंदर अनुसूचित कृषि उपज का किसान या क्षेत्र के अन्य व्यापारी से व्यापार कर सकता है’। यह धारा किसानों को अपनी उपज राज्य की सीमाओं के बाहर बेचने की अनुमति देती है। धारा 6 में कहा गया है कि ‘किसी भी प्रांतीय एपीएमसी कानून या किसी अन्य प्रांतीय कानून के तहत, चाहे उसे जो भी नाम दिया गया हो, व्यापारिक क्षेत्र में अनुसूचित कृषि उपज के व्यापार और वाणिज्य पर किसी भी किसान या व्यापारी या इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग और लेन-देन करने वाले पर कोई मार्केट फीस या सेस या लेवी नहीं लगाया जाएगा’।

दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर धरना दिए बैठे किसान

आसान शब्दों में इसका मतलब यह है कि राज्य सरकारें एपीएमसी क्षेत्रों के बाहर मार्केट फीस, सेस या लेवी नहीं ले सकती हैं। इसके अलावा संसद ने ‘मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता कानून 2020’ भी पारित किया। इसकी धारा 3 कहती है कि ‘किसान किसी भी उपज के संबंध में लिखित कृषि समझौता कर सकता है’। यह अनुबंध पर खेती के लिए एक फ्रेमवर्क देता है। नए कृषि कानून कहीं भी एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) व्यवस्था को खत्म करने या मौजूदा एपीएमसी (कृषि उपज मार्केटिंग कमेटी) व्यवस्था को छोड़ने की बात नहीं करते हैं। वास्तव में, केंद्र ने मुख्य फसलों की खरीद की एमएसपी में बढ़ोतरी की है। खरीद की मात्रा भी बढ़ी है। साल 2019 में 3.41 करोड़ टन की तुलना में 2020 में 3.89 करोड़ टन गेहूं की खरीद की गई। साल 2019 में 2.66 करोड़ टन की तुलना में 2020 में 3.16 करोड़ टन धान की खरीद की गई। खरीफ सीजन में हुई खरीद का लगभग 69% पंजाब में किया गया था।

बेशक, अनुबंध खेती के मुद्दे पर कुछ लोगों का वैचारिक मतभेद हो सकता है। उपनिवेश काल में इसे लेकर भारत का पुराना अनुभव अच्छा नहीं रहा है। वैसे खेती में अनुबंध के कई रूप हैं- जैसे नेस्ले का मामला लें, जो स्थानीय बिचौलियों के माध्यम से दूध हासिल करती है और बिचौलिये लागत कम रखने के लिए छोटे किसानों से दूध खरीदते हैं। इससे बड़ी संख्या में छोटे किसान फर्म से जुड़ते हैं। इसी तरह, मदर डेयरी फ्रूट्स एंड वेजिटेबल्स लिमिटेड लेनदेन की लागत को कम करने के लिए उत्पादकों के संघ बनाती है, जिसके नतीजे में करीब 50% सप्लाई छोटे और सीमांत किसानों से आती है।

एक और उदाहरण बागवानी का लेते हैं। हिमाचल प्रदेश में पैदा किए जाने वाले सेब को शहरी उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए आम तौर पर लंबा सफर करना होता है। विनियमित बाजारों में सीमित बुनियादी ढांचे के चलते बिक्री की प्रक्रिया के दौरान अक्सर काफी देरी होती है, जिससे माल सड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश बागवानी उत्पादन विपणन एवं प्रसंस्करण निगम लिमिटेड ने फसल कटाई के बाद की सुविधाओं का एक विस्तृत नेटवर्क, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग और फूड प्रॉसेसिंग की व्यवस्था करते हुए इस प्रक्रिया को आसान बनाने की पहल की है।

प्रमुख सेब उत्पादक इलाकों में हर 3-4 किलोमीटर पर कलेक्शन सेंटर बनाए गए हैं। कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं उपज को लंबे समय तक रखना संभव बनाती हैं। किसानों को अपनी उपज इन कलेक्शन सेंटर्स पर जमा कर रसीद लेनी होती है, जिस पर बाद में भुगतान मिल जाता है। इसकी तुलना में, प्राइवेट कंपनियों को देखें तो उन्होंने पूरे हिमाचल प्रदेश में सेब के लिए एकीकृत स्टोरेज, हैंडलिंग और परिवहन के बुनियादी ढांचे की स्थापना की है। एजेंटों के जरिये सीधी खरीद के लिए हजारों किसानों के साथ कई सालों की खरीद के अनुबंध किए गए हैं।

ऐसे किसानों को, जो अब इनके सोर्सिंग नेटवर्क के सदस्य हैं, सेब संग्रह के लिए मुफ्त प्लास्टिक क्रेट दिए जाते हैं। इस तरह इन फर्मों को अच्छी क्वॉलिटी के सेब उगाने वाले इलाकों तक पहुंच हासिल होती है, तो किसानों को आमदनी की गारंटी मिलती है। जन दबाव को देखते हुए, ऐसी कंपनियों को अपने सदस्यों से हर तरह का सेब खरीदना पड़ता है। ये फर्में किसानों को समय पर भुगतान भी करती हैं।

दोतरफा खतरा
कॉर्पोरेट/अनुबंध खेती का मकसद अगर जमीन से सिर्फ अल्पकालिक मोटा मुनाफा कमाने तक सीमित रहता है, तो खेती की तयशुदा तकनीकों के साथ एक ही फसल पर केंद्रित भारतीय किसान लकीर का फकीर बन जाएगा। अपनी जमीन और फसल की बेहतरी के लिए कुछ नया सोचने या करने की उसकी कोई आजादी नहीं होगी। अगर किसान बड़ी संख्या में नकदी फसलों की तरफ आकर्षित होंगे तो परंपरागत खाद्यान्न की खेती करने की उनकी क्षमता और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। हमारी नीतियों में यह सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है कि खेत-प्रबंधन व्यवस्था किसान का आत्मसमर्पण न सिद्ध हो और साझेदारी में वह सिर्फ एक मोहरा बनकर न रह जाए, जिसका भाग्य पूरी तरह दूसरे पार्टनर के हाथ में हो। इन सवालों पर बात करते हुए हमें प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इस मजबूत सरकार द्वारा स्थापित गहरे संरचनात्मक सुधारों का स्वागत करना चाहिए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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