क्या कट्टर इस्लामी पार्टियों के हाथ में जा रहा पाकिस्तान? सेना-विपक्ष की लड़ाई से बढ़ी इमरान की मुश्किलें

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इस्लामाबाद
पाकिस्तान में इन दिनों राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। इमरान खान और उनकी सहयोगी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ समूचा विपक्ष एकजुट हो गया है। लंदन में भगोड़े का जीवन जी रहे नवाज शरीफ ही नहीं, बल्कि बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भी सेना पर चुनाव में धांधली का इल्जाम लगा चुके हैं। इतना ही नहीं, विपक्ष के साथ पाकिस्तान की धार्मिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजल-उर-रहमान उर्फ मौलाना डीजल भी आ गए हैं। उन्हें संयुक्त विपक्ष के गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का नेता भी घोषित किया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान फिर से इस्लामी ताकतों के हाथ में जा रहा है।

कट्टर धार्मिक पार्टियों के लिए अच्छा मौका
पाकिस्तान में इस्लामी पार्टियों का अस्तित्व हमेशा ही दोयम दर्जे का रहा है। ये पार्टियां किसी न किसी बड़ी पार्टी के पीछे लगकर उसके लिए धार्मिक वोटों को बटोरने का काम करती हैं। लेकिन पिछले साल इस्लामाबाद को घेरने के लिए मौलाना डीजल ने जो मोर्चेबंदी की थी, इससे उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई है। वहीं, इस समय पाकिस्तान की मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) नेतृत्व विहीन हैं।

प्रमुख विपक्षी पार्टियां नेतृत्व विहीन
पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) के अध्यक्ष नवाज शरीफ इस समय सजा के डर से लंदन में छिपे हुए हैं। पाकिस्तानी कोर्ट तो लंदन तक उनके गिरफ्तारी का वारंट भेज चुकी है। जबकि उनके भाई और प्रमुख विपक्षी नेता शहबाज शरीफ मनी लॉन्ड्रिंग के केस में जेल में हैं। रही बात पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की तो बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद इस पार्टी में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो वोट खींच सके। बिलावल भुट्टो को लोग हल्के में लेते हैं, जबकि आसिफ अली जरदारी पर भ्रष्टाचार का केस चल रहा है।

पाकिस्तानी पीएम पद के प्रबल दावेदार हैं मौलाना
शायद, इसी मौके का इंतजार मौलाना डीजल और उनकी तरह की अन्य पाकिस्तानी धार्मिक पार्टियां कर रही थी। माना जा रहा है कि अगर इमरान खान को सत्ता से हटाने में विपक्षी गठबंधन सफल हो जाता है तो वे प्रधानमंत्री पद के पहले दावेदार होंगे। पाकिस्तानी सेना के लिए भी मौलाना को पद से हटाना मुश्किल होगा। क्योंकि, मिस्र ने हमें दिखाया है कि सैन्य तानाशाहों के लिए राजनीतिक इस्लामवाद से लड़ना कितना कठिन है।

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कौन हैं मौलाना डीजल
मौलाना फजल-उर-रहमान सुन्नी कट्टरपंथी दल और पाकिस्तान की धार्मिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख हैं। उनके पिता खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मौलाना भी खुद पाकिस्तानी संसद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। मौलाना पाकिस्तान में विदेश नीति को लेकर संसद की समिति और कशमीर समिति के भी प्रमुख रह चुके हैं।

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केंद्रीय मंत्री का मिल चुका है दर्जा
मौलाना फजल-उर-रहमान को नवाज शरीफ सरकार के दौरान केंद्रीय मंत्री का दर्जा दिया गया था। 2018 में उन्हें सरकार विरोधी समूह की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन वह चुनाव में आरिफ अल्वी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। मौलाना तालिबान के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। हालांकि वे खुद को उदारवादी होने का दावा करते हैं।



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