क्रिसमस की रात आसमान से गुजरेगा 200 मीटर का ऐस्टरॉइड, 36 हजार किमी प्रति घंटा होगी स्पीड

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वॉशिंगटन
इस साल क्रिसमस की रात आसमान में आतिशबाजी देखने को मिल सकती है। 25 दिसंबर को 2014 SD224 नाम का ऐस्टरॉइड लगभग 36 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती के नजदीक से गुजरेगा। इस ऐस्टरॉइड को पहली बार सितंबर 2014 में खोजा गया था। तभी यह अंदाजा लगाया गया था कि कुछ साल बाद यह हमारी धरती के पास से गुजर सकता है। इस ऐस्टरॉइड की मोटाई 200 मीटर के आसपास मापी गई है।

25 दिसंबर की रात आएगा धरती के सबसे करीब
नासा के सेंटर फॉर नियर अर्थ ऑब्जेक्ट स्टडीज का अनुमान है कि 25 दिसंबर की रात को 2014 एसडी 224 धरती के सबसे करीब आ जाएगा। नासा के वैज्ञानिकों ने अपने बयान में कहा कि ऐस्टरॉइड धरती से लगभग 30 लाख किलोमीटर की सुरक्षित दूरी से गुजर जाएगा। इस कारण ऐस्टरॉइड का कोई भी प्रभाव धरती पर पड़ने की उम्मीद नहीं है। बता दें कि जो भी ऐस्टरॉइड धरती की कक्षा को काटती हैं उन्हें संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है।

दूसरे ऐस्टरॉइड भी आने वाले हैं धरती के करीब
2014 एसडी 224 क्रिसमस की रात को धरती के पास आने वाला इकलौता ऐस्टरॉइड नहीं होगा। बल्कि, क्रिसमस से एक दिन पहले भी दो ऐस्टरॉइड धरती के पास से गुजरेंगे। इनमें से एक का नाम 2012 XE133 है। इसकी मोटाई लगभग 120 मीटर के आसपास है। नासा धरती के करीब आने वाले सभी ऐस्टरॉइड्स पर करीबी नजर बनाए हुए है।

अगले 100 सालों तक NASA की नजर
NASA का Sentry सिस्टम ऐसे खतरों पर पहले से ही नजर रखता है। इसमें आने वाले 100 सालों के लिए फिलहाल 22 ऐसे ऐस्टरॉइड्स हैं जिनके पृथ्वी से टकराने की थोड़ी सी भी संभावना है। इस लिस्ट में सबसे पहला और सबसे बड़ा ऐस्टरॉइड 29075 (1950 DA) जो 2880 तक नहीं आने वाला है। इसका आकार अमेरिका की एम्पायर स्टेट बिल्डिंग का भी तीन गुना ज्यादा है और एक समय में माना जाता था कि पृथ्वी से टकराने की इसकी संभावना सबसे ज्यादा है।

धरती से टकरा सकता है यह Asteroid
2020-2025 के बीच 2018 VP1 नाम Asteroid के पृथ्वी से टकराने की संभावना है लेकिन यह सिर्फ 7 फीट चौड़ा है। इससे बड़ा 177 फीट का Asteroid 2005 ED224 साल 2023-2064 के बीच पृथ्वी से टकरा सकता है।


क्या होते हैं Asteroids?
ऐस्टरॉइड्स वे चट्टानें होती हैं जो किसी ग्रह की तरह ही सूरज के चक्कर काटती हैं लेकिन ये आकार में ग्रहों से काफी छोटी होती हैं। हमारे सोलर सिस्टम में ज्यादातर ऐस्टरॉइड्स मंगल ग्रह और बृहस्पति यानी मार्स और जूपिटर की कक्षा में ऐस्टरॉइड बेल्ट में पाए जाते हैं। इसके अलावा भी ये दूसरे ग्रहों की कक्षा में घूमते रहते हैं और ग्रह के साथ ही सूरज का चक्कर काटते हैं। करीब 4.5 अरब साल पहले जब हमारा सोलर सिस्टम बना था, तब गैस और धूल के ऐसे बादल जो किसी ग्रह का आकार नहीं ले पाए और पीछे छूट गए, वही इन चट्टानों यानी ऐस्टरॉइड्स में तब्दील हो गए। यही वजह है कि इनका आकार भी ग्रहों की तरह गोल नहीं होता। कोई भी दो ऐस्टरॉइड एक जैसे नहीं होते हैं।



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