गरीबी झेल चुके 69 साल के इस महारथी को क्या हरा पाएंगे ये 3 ‘धनपुत्र’?

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पटना
कोरोना काल में हो रहा इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायने में अलग है। प्रचार प्रक्रिया से लेकर वोटिंग के दौरान बूथ पर कई बदलाव दिखेंगे। इन सबके बीच इस बार के चुनाव में बिहार की राजनीति जेनरेशन शिफ्ट हो रही है। इस चुनाव में जितने भी अहम चेहरे दिख रहे हैं उसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एकमात्र ऐसे नेता बचे हैं जिन्होंने गरीबी और गुरबत देखी है। यह लाइन को पढ़ने के बाद आप गरीबी देख चुके मौजूदा दौर में सक्रिय कई नेताओं के नाम गिना सकते हैं, जो सही भी हैं। लेकिन यहां बात बिहार चुनाव में मुख्य रूप से मुकाबले में जो चेहरे दिख रहे हैं उनकी बात हो रही है। इस लिहाज से देखें तो एनडीए का नेतृत्व सीएम नीतीश कुमार कर रहे हैं, वहीं महागठबंधन का जिम्मा युवा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप के कंधों पर है। चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले चिराग पासवान भी युवा ही हैं।

युवाओं की सेना से 69 के महारथी का मुकाबला

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उम्र इस वक्त 69 साल है। चुनाव में उनके सामने चुनौती पेश कर रहे तेजस्वी यादव की उम्र 30 और उनके भाई तेज प्रताप यादव की उम्र 32 साल है। दोनों भाइयों की उम्र को जोड़ दें तो भी यह नंबर 62 तक ही पहुंचता है। वहीं लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान भी नीतीश कुमार को हराने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। चिराग पासवान की उम्र भी 37 साल है। एलजेपी जब से बिहार में एनडीए से अलग हुई है तब से चिराग दोबारा से तेजस्वी यादव की तारीफ करना शुरू कर चुके हैं। इस वक्त बिहार की राजनीति में तेजस्वी और चिराग दोनों राजनीतिक दुश्मन नीतीश कुमार बने हैं। चिराग और तेजस्वी उम्र को जोड दें तो तो भी यह नंबर 67 ही पहुंचता है, जो कि नीतीश की उम्र से दो साल कम ही है।

गुरबत झेलकर निकले लालू, नीतीश, रामविलास

जेपी आंदोलन में छात्र नेता के रूप में राजनीति में आए नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान तीनों गांव से ताल्लुक रखते हैं। तीनों नेता सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़े और राजनीति की ऊंचाइयों तक पहुंचे। इन सभी ने गरीबी और गुरबत को ना केवल नजदीक से देखा है, बल्कि उसी में पले-बढ़े। शायद यही वजह रही कि इनकी राजनीति भी इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लालू प्रसाद यादव कई बार मंच से कह चुके हैं कि उनकी मां 100 रुपये का नोट नहीं पहचानती थीं। इस हालत से आने वाले लालू यादव को धन कमाने का ऐसा जुनून चढ़ा कि तमाम घोटालों में उनका और उनके परिवार के लोगों का नाम आया। आलम यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में दोषी होकर लालू प्रसाद यादव सजा काट रहे हैं।

सिल्वर स्पून ब्वॉयज से दो-दो हाथ कर रहे नीतीश

इस बार के विधानसभा चुनाव में तीनों प्रमुख चेहरों में नीतीश कुमार एकलौते ऐसे बचे हैं जो राजनीति की पिच पर बैटिंग कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि गरीबी-गुरबत से उठे नीतीश सिल्वर स्पून ब्वॉयज तेजस्वी, तेज प्रताप, चिराग सरीखे युवा चेहरों से मुकाबला कर रहे हैं। इन सभी की तुलना करें तो नीतीश ने जहां असली भारत के हर रंग को जिया है वहीं तेजस्वी या चिराग ने गरीबी की आग की लपट को दूर से भी अनुभव नहीं किया है। इतना ही नहीं इन्हें राजनीति विरासत में मिली है, जबकि नीतीश, लालू और रामविलास ने अपनी मेहनत लगन और बौद्धिक क्षमता से अपनी राजनीतिक जमीन बनाई है।

बीजेपी की कमान भी युवाओं के हाथों में

स्वभाविक है कि नीतीश कुमार अगर बिहार की राजनीति से विदा होते हैं तो उनके साथ ही राज्य की राजनीति में एक युग गुजर जाएगा। बीजेपी में सुशील कुमार मोदी उस दौर के एक मात्र बड़ा चेहरा बचे हैं। जिन्हें रिप्लेस करने के लिए 54 वर्षीय नित्यानंद राय, इतने ही उम्र के संजय जायसवाल, 47 वर्षीय मंगल पांडेय जैसे कई और युवा चेहरे कतार में हैं।

पप्पू यादव और मुकेश साहनी जैसे नेता भी युवा चेहरा

इसके अलावा दूसरी पार्टियों की बात करें तो वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी जो की अति पिछड़ा की राजनीति करते हैं, वह भी 39 साल के हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह ने भी बेटे शुभानंद मुकेश को अपना उत्तराधिकारी बना दिया है। 52 वर्षीय पप्पू यादव सरीखे नेता भी लालू-नीतीश युग के मुकाबले युवा ही माने जाएंगे। इस तरह साफ तौर से दिख रहा है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की राजनीति पूरी तरह से युवाओं के हाथों में चली जाएगी। हालांकि यह जनता पर तय होगा कि वह अभी नीतीश का युग कुछ दिन और चलाना चाहती है या नहीं।



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