गिरती क्यों जा रही वित्त मंत्रालय की हैसियत

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लेखकः अरविन्द मोहन
जिस तरह रूठा और अभावग्रस्त बच्चा रोते-रोते सोकर शांत हो जाता है, कुछ उसी तरह जीएसटी विवाद पर हो हल्ला मचाने और विरोध करने जैसे उपायों की सीमा देखते हुए राज्य सरकारें भी केंद्र की ‘सलाह’ पर रिजर्व बैंक से उधार लेने को राजी होती दिख रही हैं। इनमें कांग्रेस की वे सरकारें भी शामिल हैं जो केंद्र के सुझाव का तीखा विरोध कर रही थीं। माना जा रहा है कि जितनी रकम की कमी थी, उसका लगभग चालीस फीसदी उधार लिया भी जा चुका है। केंद्र ने आमदनी कम होने और जीएसटी की वसूली में गिरावट आने के नाम पर राज्यों को उनके हिस्से का लगभग 2 लाख 30 हजार करोड रुपया नहीं दिया है। हालांकि सारा दोष जीएसटी वसूली को नहीं दिया जा सकता क्योंकि उसमें अप्रैल से अगस्त तक की कुल कमी भी उस 2.30 लाख करोड़ से नीचे ही है जो केंद्र ने राज्यों को नहीं दिया है। साफ है कि केंद्र ज्यादा खर्च कर रहा है और खुद रिजर्व बैंक से उधार लेने की जगह कर्ज का बोझ राज्यों पर डालना चाहता है। संकट में अवसर तलाशते हुए वह को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म को जमीन में गाड़ चुका है।

जेटली का वायदा
राज्यों की हालत वैसे भी खराब है। चाहे कर्मचारियों की तनख्वाह हो या कोरोना की रोकथाम से जुड़ी अन्य जरूरतें, राज्य अपने खर्चों को ज्यादा समय तक टालने की स्थिति में नहीं हैं। यह सही है कि केंद्र की आमदनी कम हुई होगी और खर्च उसके भी हैं लेकिन जीएसटी का मामला खास है। ‘एक देश, एक टैक्स’ के नाम पर जब राज्यों से तरह-तरह की टैक्स वसूली छोड़ने को लेकर पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सहमति ली तो यह वायदा भी किया था कि राज्यों को उनका पूरा हिस्सा देने के साथ पांच साल तक हर साल 14 फीसदी की वृद्धि भी दी जाएगी। वर्षों की चर्चा के बाद अनेक तरह की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए तब यह तर्क दिया जा रहा था कि इससे करों में समानता तो आएगी ही, साथ में कर वसूली भी बढ़ती जाएगी। तभी साल में 14 फीसदी इजाफे की गारंटी दी गई थी। माना गया था कि कर वसूली का झंझट तथा खर्च घटेगा और उद्योग व्यापार के लिए तो रामराज्य ही आ जाएगा।

वित्त मंत्रालय से बाहर आतीं वित्त मंत्री निर्माल सीतारमण और उनकी टीम

इसलिए यह सिर्फ मोदी जी या बीजेपी का चुनावी वायदा नहीं था और ना ही इसे ‘एक्ट आफ गॉड’ के नाम से भूल-चूक लेनी-देनी वाले खाते में डाला जा सकता है। यह केंद्र और राज्यों के बीच हुआ लिखत-पढ़त वाला एक राजनीतिक समझौता है और इसकी मियाद 2022 तक है। अब भले ही नोटबंदी की तरह जीएसटी को सरकार अपनी शान बताने में हिचके लेकिन शुरु में इसे सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाया जाता था और सहकारी संघवाद का असली उदाहरण बताया जाता था। कहना न होगा कि राज्यों की, खासकर शराबबंदी वाले राज्यों की हालत वैसे ही खराब है। उनकी आमदनी का एक बडा स्रोत- सिनेमा टिकटों का मनोरंजन कर शून्य हो गया है। उपकर वगैरह लगाकर कुछ आमदनी करने का रास्ता भी बंद है। यही कारण है कि सारी आलोचना के बाद भी उनको मंदिर बंद रखने और शराबखाने खोलने में हिचक नहीं हुई। बार खोलना प्राथमिकता है, जिम और स्कूल बंद हैं।

दूसरी ओर केंद्र के खर्चों में कोई फर्क नहीं दिख रहा है। वीआईपी विमान की खरीद से लेकर इंडिया गेट परिसर के नए निर्माण तक सारे काम चल रहे हैं। असल में राजनीतिक प्रबंधन या कहें चुनावी प्रबंधन में माहिर मोदी जी के लिए वित्तीय या राजकोषीय प्रबंधन का कोई खास महत्व नहीं रहा है। राजकोषीय जरूरतों को उन्होंने अपनी राजनीतिक तथा प्रशासनिक जरूरतों से नीचे ही रखा है। इसका व्यावहारिक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ा है, यह हिसाब-किताब तो यहां देना मुश्किल है, लेकिन राजनीतिक परिणाम स्पष्ट है कि राज्यों की ही नहीं, वित्त मंत्री और उनके मंत्रालय की भी हैसियत काफी गिर गई है। यह इस तथ्य के बावजूद हुआ कि अरुण जेटली जैसे बड़े कद वाला व्यक्ति वित्त मंत्री था जिसने आगे बढ़कर कोई वायदा राज्यों से किया। सो वर्तमान वित्त मंत्री के लिए ‘एक्ट आफ गॉड’ का हवाला देना मात्र जिम्मेदारी से भागना नहीं बल्कि उनकी लाचारी भी है।

मोदी राज में राजनीतिक और प्रशासनिक प्रबंधन मात्र राजकोषीय प्रबंधन पर भारी नहीं पड़ा है। इस दौर में मौद्रिक प्रबंधन भी उसके आगे नतमस्तक हुआ है। भारत ही नहीं सारी दुनिया में राजनीतिक प्रबंधन और मौद्रिक प्रबंधन का टकराव होता है। यूपीए के पिछले शासन काल में वित्त मंत्री चिदंबरम लाख चाहते रहे लेकिन उनके समय के रिजर्व बैंक के दोनों गवर्नरों ने ब्याज दरें नहीं घटाईं। इसके विपरीत मोदी राज में नोटबंदी से लेकर रिजर्व बैंक के सुरक्षित कोष से पैसे निकालने तक ऐसा कोई एक मामला याद कीजिए जहां सरकार की इच्छा के खिलाफ रिजर्व बैंक ‘अड़ा’ हो? रिपो रेट और रिवर्स रिपो रेट गिराना बाएं हाथ का खेल हो गया है। इस चक्कर में कोई रघुराम राजन, ऊर्जित पटेल या विरल आचार्य हाथ-पांव पटकता बाहर निकल जाए तो निकल जाए सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा।

समायोजन के नाम पर
अब जब एकदम मनचाहा अधिकारी समेत सारा कुछ अनुकूल हो गया है तो राजकोषीय अनुशासन ही नहीं पूरी बैंकिग प्रणाली संकट में है। बैंकों के एनपीए में डरावनी वृद्धि देखी जा रही है और हर तीन महीने में वित्तीय समायोजन के नाम पर कर्जों को ‘इधर उधर’ करके काम चलाया जा रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक जरूरतों की अनदेखी नहीं हो यह तो ठीक है (चुनावी जरूरतें उनमें शामिल नहीं हैं) लेकिन राजकोषीय और मौद्रिक प्रबंधन की जरूरतों को कमतर महत्व की बात मानना एक बड़ी गलती है। उससे जो अव्यवस्था फैलती है उसमें जेटली जी का करार टूटना बहुत छोटी चीज है। एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों का जीवन इससे कठिनाई में पड़ सकता है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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