चारों धामों को राज्यों के कंट्रोल से मुक्त करने के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट का किया रुख

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हाइलाइट्स:

  • स्वामी उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है
  • उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है
  • इससे पहले हाई कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका को खारिज कर दिया था
  • चार धाम मंदिरों में केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री शामिल हैं

नई दिल्ली
अपने बयानों के चलते सुर्खियों में रहने वाले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 21 जुलाई, 2020 को उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिसमें चार धाम देवस्थानम प्रबंधन के गठन के माध्यम से राज्य सरकार के चार धाम और 51 अन्य तीर्थ स्थलों के अधिग्रहण को चुनौती दी गई। है। इससे पहले हाई कोर्ट ने देवस्थानम अधिनियम की वैधता को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया कि राज्य के पास मंदिरों का स्वामित्व होगा और बोर्ड के पास प्रशासन और संपत्तियों के प्रबंधन की शक्ति होगी। बता दें कि चार धाम मंदिरों में केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री शामिल हैं।

दरअसल सुब्रमण्यम स्वामी ने तर्क दिया था कि इन धामों पर पूजा करने वाले एक अलग धार्मिक संप्रदाय के थे, इसलिए धर्मस्थलों का स्वामित्व, प्रबंधन और उनका प्रशासन करना उनका अधिकार था। लेकिन हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आस्तिक और वैष्णव रूप में पूजा करने वाले के रूप में विश्वास करने वाले उपासक नहीं हैं।

स्वामी ने देवस्थानम मैनेजमेंट बोर्ड के फैसले को दी थी चुनौती
स्वामी के चले जाने के बाद, दो एनजीओ – धर्म और इंडिक कलेक्टिव जो कि सबरीमाला मामले में सबसे आगे थे ने भी सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। जिसकमें वकील सुविदत्त सुंदरम द्वारा धर्मनिरपेक्ष राज्य की कार्रवाई में खुद को सब कुछ प्रबंधित करने की भूमिका में प्रवेश करने की कार्रवाई पर सवाल उठाया था। स्वामी ने हाई कोर्ट में राज्य सरकार द्वारा चार धाम देवस्थानम मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के फैसले को चुनोती दी थी,राज्य सरकार ने बनाकर चार धाम और अन्य 51 मंदिरों का कंट्रोल अपने पास कर लिया था।

स्वामी ने बताया था मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
स्वामी ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि अधिनियम की पूरी योजना और संदर्भ धार्मिक समुदायों या मंदिर को प्रशासित या प्रबंधित करने के लिए किसी भी स्वतंत्रता या स्वायत्तता को नकारती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि सरकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 25, 26, और 29 (1) के तहत हिंदू नागरिकों और संप्रदायों सहित सभी नागरिकों और संप्रदायों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रही है।
उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है
स्वामी ने दिया ये तर्क
स्वामी ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य सरकार की कार्रवाई संवैधानिक सिद्धांतों का मखौल उड़ाती हैं और कानूनी प्रक्रिया और मूर्ति शक्ति का दुरुपयोग करती हैं और दुर्भावनापूर्ण और बाहरी विचारों से प्रभावित होती हैं। स्वामी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट की ओर से यह कहना गलत था कि विश्वासियों को, जिनमें शैव और वैष्णव की पूजा के रूप शामिल हैं, वे पूज्य नहीं हैं। वहीं हाई कोर्ट ने सनातन धर्म को हिंदू संप्रदाय के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया।

क्या थी हाई कोर्ट की टिप्पणी?
अदालत ने कहा कि “हिंदू धर्म को ‘सनातन’ कहा जाता है, यानी जिसका शाश्वत मूल्य है: एक जो न तो समय-सीमा है और न ही अंतरिक्ष से जुड़ा है।” चूंकि सभी हिंदू, बड़ी संख्या में सनातन धर्म में आस्था रखते हैं, इसलिए उन्हें किसी भी धार्मिक संप्रदाय के समान नहीं माना जा सकता। सबरीमाला फैसले (2018) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि हिंदू या हिंदू धर्म की कोई भी जाति या उप-जाति या संप्रदाय, जो मुख्य रूप से किसी विशेष देवता या देवता की पूजा नहीं करते, उन्हें धार्मिक संप्रदाय कहा जा सकता है। वहीं स्वामी ने तर्क दिया था कि हाई कोर्ट ने देवस्थानम अधिनियम की वैधता और संवैधानिकता को बरकरार रखने में मिटा दिया, “क्योंकि इसके प्रावधान छोटा चार धाम मंदिरों के सभी भक्तों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।



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