चीनी ड्रोन्‍स का मुकाबला करेंगे रुस्‍तम-2 और इजरायली हेरॉन, इनमें मिसाइलें और बम लगाने जा रहा भारत

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चीन ने पूर्वी लद्दाख में तेवर दिखाए तो भारत चौकन्‍ना हो गया। उसके ड्रोन्‍स और फाइटर जेट्स कई बार सीमा के आस-पास मंडराते नजर आए। भारत ने अपने पास मौजूद सभी विकल्‍प बॉर्डर के पास मौजूद रखे हैं। सर्विलांस के लिए ड्रोन्‍स का सहारा तो लिया ही जा रहा है, उन्‍हें और बेहतर बनाने की तैयारी है। डिफेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन ने डेवलपमेंट का काम तेज कर दिया है। शुक्रवार को रुस्‍तम-2 ड्रोन का सफल फ्लाइट टेस्‍ट हुआ। इसके अलावा इजरायल से मिले हेरान ड्रोन्‍स को भी मिसाइलों और लेजर गाइडेड बमों से लैस करने की तैयारी है। पीएलए अपनी ड्रोन पावर की डींगे कई बार हांक चुका है। भारत की तैयारी अपने अंदाज में चीन को मात देने की है।

26 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकता है रुस्‍तम-2

कर्नाटक के चित्रदुर्गा में रुस्‍तम का फ्लाइट टेस्‍ट हुआ। यह 16 हजार फीट की ऊंचाई पर लगातार 8 घंटे तक उड़ान भरता रहा। इसके बावजूद उसमें एक घंटे उड़ने के लिए काफी ईंधन बच गया था। 2020 के आखिर तक इस प्रोटोटाइप के 26,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता हासिल कर लेने की उम्‍मीद है। इसका फ्लाइट टाइम भी बढ़कर 18 घंटे करने पर काम हो रहा है।

जैसी मिशन की जरूरत, वैसा पेलोड ले जा सकता है ड्रोन

रुस्‍तम-2 मिशन की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग तरह के पेलोड्स ले जा सकता है। इस ड्रोन के साथ सिंथेटिक अपर्चर रडार, इलेक्‍ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सिस्‍टम और सिचुएशनल अवेयरनेस सिस्‍टम भेजा जा सकता है। इसमें एक सैटेलाइट कम्‍युनिकेशन लिंक भी है जो युद्ध की स्थिति में हालात की जानकारी रियल टाइम में दे सकता है।

हेरॉन की टक्‍कर का ड्रोन बन सकता है रुस्‍तम-2

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DRDO का मकसद रुस्‍तम-2 को इजरायल के हेरॉन UAV की टक्‍कर का ड्रोन बनाना है। हेरॉन को एयरफोर्स और नेवी पहले से ही यूज कर रही है। रुस्‍तम-2 के डेवलपमेंट को चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद तेज किया गया है। हालांकि सेना का हिस्‍सा बनने से पहले इसे कड़े टेस्‍ट्स और यूजर ट्रायल्‍स से गुजरना होगा।

हेरॉन के अपग्रेड में लगी होंगी मिसाइलें और बम

भारत सरकार इजरायली ड्रोन्‍स की पूरी फ्लीट को अपग्रेड करना चाहती है। इसके प्रस्‍ताव को रक्षा अधिग्रहण परिषद से मंजूरी मिल चुकी है। हेरॉन ड्रोन्‍स में हवा से जमीन में मार करने वाली मिसाइल और लेजर गाइडेड बम लगाए जाएंगे। इसके अलावा एक सैटेलाइट लिंक भी लगाया जाएगा ताकि इन्‍फॉर्मेशन पहुंचने में देरी न हो।



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