‘टिकाऊ’ की जगह ‘जिताऊ’ बने जरूरत

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जब कांशीराम जिंदा थे, और जब उनकी पार्टी ताकत बनने की दिशा में बढ़ रही थी, तब एक बड़ी पार्टी के नेता ने उनसे मुलाकात की। कांशीराम बहुत खरी-खरी बात कहने के लिए जाने जाते थे। उन्हें इस बात कोई फिक्र नहीं होती थी कि सामने वाले बंदे का स्टेटस क्या है। उन्हें जो कहना होता था, वे दो टूक बोल देते थे। उस नेता की कांशीराम से मुलाकात बीएसपी के ही एक मिशनरी के जरिए हुई थी। कांशीराम ने पूछा किस मकसद से मुलाकात करने आए हो, तो उनका जवाब था, बस आपके दर्शन का इच्छुक था। कांशीराम ने कहा कि कोई मेरे दर्शन बगैर किसी मकसद के नहीं करता है। अगर सिर्फ दर्शन का इरादा था, तो फिर दर्शन हो गए। अभी मुझे बहुत काम है। उस नेता ने घबराहट के साथ उस मिशनरी की तरफ देखा। उसने इशारा किया कि सीधे मकसद पर आ जाओ। नेता ने मकसद बताना शुरू किया, ‘साहब, आपकी इजाजत हो, तो मैं आपकी पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता हूं। गारंटी है कि सीट आप ही जीतोगे।’ कांशीराम ने कहा, ‘आप गलत आदमी के पास आ गए हो। मुझे सीट जिताने वाले लोगों की तलाश नहीं है। मुझे तो टिकने वाले लोगों की तलाश है। अब आप जा सकते हैं।’ कमरे में सन्नाटा छा गया, लेकिन कांशीराम बिल्कुल सामान्य थे, लगा कुछ हुआ ही नहीं। वे अब दूसरे लोगों से मुलाकात की तरफ बढ़ गए। यह बात दीगर है कि उनके न रहने के बाद अब उनकी पार्टी में टिकट दूसरी पार्टियों की तरह बंटने लगे हैं। इस प्रसंग का जिक्र इसलिए कि बिहार चुनाव के मौके पर रातों रात दल बदलने का खेल बड़ी शिद्दत के साथ चल रहा है। जिन्हें टिकट नहीं मिल रहा है, उन्हें दल और विचारधारा बदलने में कोई संकोच नहीं हो रहा है।

विचार से बड़ा बना पैसा
ऐसा नहीं कि बिहार में जो कुछ हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। टिकट पाना अब नेताओं की प्राथमिकता है, पार्टी चाहे कोई भी हो। छोटे लोहिया के नाम से मशहूर रहे समाजवादी नेता स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र ने समाजवादी पार्टी में रहते हुए एक इंटरव्यू में कहा था, ‘विचारधारा आलमारी में टंगे कपड़ों की तरह नहीं होती कि आज दिल किया तो लाल रंग का कुर्ता पहन लिया, कल दिल हुआ तो काले रंग की शर्ट पहन ली। विचारधारा आत्मा की तरह होती है। जब कोई शख्स समाजवादी पार्टी से टिकट पाने के लालच में रात के अंधेरे में मुझसे मुलाकात करता है, तो उसे कोई शर्मिंदगी भले ही न हो रही होती हो, लेकिन मुझे जरूर कोफ्त हो रही होती है कि मुझे आज ऐसे किसी शख्स से बात करनी पड़ रही है, जिसकी आत्मा मर चुकी है।’ जनेश्वर मिश्र ने उस इंटरव्यू में माना था कि ‘बदलते दौर की राजनीति में कई मौकों पर वे अपनी आंखें बंद करने को मजबूर हो जाते हैं।’

ऐसा होना स्वाभाविक था क्योंकि पार्टियों की प्राथमिकताएं बदलने लगी थीं। अब तो हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। पार्टियां अब पूरी तरह आश्वस्त हैं। उन्हें जिताऊ उम्मीदवार चाहिए होते हैं। टिकट बंटने के वक्त अब यह सोचा ही नहीं जाता कि बंदा कितने दिन साथ रहेगा? राजनीतिक दलों के लिए पहले नंबर का ‘खेल’ मजबूत करना ज्यादा जरूरी हो गया है। यह माना जाने लगा है कि अगर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गए, तो कोई भी बंदा साथ छोड़कर जाने वाला नहीं है, उल्टे दूसरी पार्टियों के लोगों को तोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर जरूरी नंबर तक नहीं पहुंचे, तो रेस से बाहर हो जाने का खतरा तो होता ही है, साथ ही पार्टी टूटने का भी। पार्टियों को ‘जिताऊ’ उम्मीदवार इस मायने में भी ‘मुनाफे का सौदा’ लगते हैं कि उनके लिए ‘इलेक्शन खर्च’ जुटाने की झंझट नहीं होती। लोहिया के साथी रह चुके स्वर्गीय रामशरण दास पुराने दिनों को याद करते हुए बताया करते थे कि ‘एक समय वह हुआ करता था जब पार्टियों को अपने प्रत्याशियों के चुनावी खर्च को पूरा करने के लिए चंदा जुटाना पड़ता था।’ लेकिन बाद के दिनों में टिकट उम्मीदवारों से यह पूछा जाने लगा कि वे चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं? जो जितना अमीर होता है, उसके टिकट पाने की गुंजाइश उतनी ही बढ़ जाया करती है।

खेल छुपन-छुपाई का
लेकिन टिकाऊ से जिताऊ पर आने का साइड इफेक्ट यह हुआ है कि सरकार गठन के वक्त ही नहीं, उसके बाद भी जब कभी कोई राजनीतिक संकट खड़ा होता है, पार्टियों की सबसे पहली प्राथमिकता अपने विधायकों को छुपाने की हो जाती है। पार्टियों को मालूम होता है कि ये जो लोग जीतकर आए हैं, उनका उनके साथ कोई इमोशनल अटैचमेंट नहीं है। विचारधारा के साथ भी उनका कोई जुड़ाव नहीं है, ऐसे में उनका पाला बदलना बहुत आसान है। वे कभी भी पाला बदल सकते हैं। और ऐसा लगातार हो भी रहा है। दलबदल को रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून लाया गया और उसमें यह शर्त भी जोड़ी गई कि अगर दो तिहाई से कम सदस्य पार्टी से अलग होते हैं तो उनकी सदस्यता चली जाएगी। लेकिन खुद पार्टियों ने इस कानून को बेअसर बना दिया। उन्होंने सदन की सदस्यता से इस्तीफा दिलवाने का नया ट्रेंड शुरू कर दिया। उपचुनाव में उन्हें अपनी पार्टी से टिकट दे देते हैं। दलबदल कानून के जरिए सदस्यता जाने पर सदन के उस कार्यकाल में चुनाव लड़ने पर रोक होती है। जब इस तरह के खेल खेले जाने हैं तो फिर पार्टियों को टिकाऊ उम्मीदवारों की जरूरत भी नहीं रह गई है। कई मौके पर तो ऐसे भी उदाहरण देखे गए कि उम्मीदवार ने पार्टी की सदस्यता लेने की जरूरत भी नहीं समझी, और उसे टिकट मिल गया। वक्ती जरूरत की राह पर पार्टियां और उम्मीदवार दोनों ही चल पड़े हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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