दरकने लगी हैं गूगल और ऐपल स्टोर्स की मंडियां

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पिछले महीने गूगल ने अपने प्ले स्टोर से पेटीएम को यह कहते हुए हटा दिया कि वह उसकी नीतियों का उल्लंघन कर रहा है। इससे पहले गूगल ने फूड डिलिवरी ऐप जोमाटो और स्विगी को भी ऐसे ही नोटिस भेजे। वहीं ऐपल तो इस साल चार हजार से अधिक ऐप्स को अपने स्टोर से तरह-तरह के बहाने बनाकर हटा चुका है। भारत सहित दुनिया भर में स्टार्टअप शुरू करने वाले ऐप्स मार्केट में गूगल और ऐपल के एकाधिकार से परेशान हो चुके हैं।

मोबाइल फोन की दुनिया में गूगल प्ले स्टोर और ऐपल ऐप स्टोर नाम की दो सबसे बड़ी मंडियां हैं। इन दोनों मंडियों में दुनिया भर में बनने वाले तरह-तरह के ऐप्स फ्री में भी मिलते हैं और बिकते भी हैं। जैसे फेसबुक या आरोग्य सेतु ऐप फ्री हैं, लेकिन गेमिंग से लेकर कला और विडियो एडिटिंग की दुनिया में हजारों ऐप्स ऐसे हैं, जो लोग पैसे देकर खरीदते हैं। पिछले साल दुनिया में लोगों ने 338 खरब रुपए (461.7 बिलियन डॉलर) के ऐप्स खरीदे हैं। 2021 में इस मार्केट में 507 खरब रुपए (693 बिलियन डॉलर) के ऐप्स बिकने का अनुमान है और 2023 तक इसके 685 खरब रुपए (935 बिलियन डॉलर) तक पहुंचने की उम्मीद है।

गूगल और ऐपल पर इस मार्केट में अपना एकाधिकार कायम करने के आरोप लग रहे हैं। इनकी कमाई का अंदाजा लगाने वाली संस्था सेंसर टावर की रिपोर्ट है कि इस साल की तीसरी तिमाही तक अकेले ऐपल अपने स्टोर से 19 बिलियन डॉलर कमा चुका है तो गूगल ने अपने प्ले स्टोर से 10.3 बिलियन डॉलर कमाए हैं। यहां मजे की बात यह है कि अधिकतर लोगों के पास एंड्रॉयड फोन होते हैं, तो ऐपल के मुकाबले एंड्रॉयड ऐप्स तीन गुना ज्यादा डाउनलोड होते हैं, मगर कमाई ऐपल की ज्यादा होती है। अपनी रिपोर्ट में सेंसर टावर ने बताया है कि यह कमाई गूगल के प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर से 36.5 बिलियन ऐप्स बिकने से हुई है। पिछले साल के मुकाबले इस साल सामान्य से 23.3 फीसदी अधिक लोगों ने ऐप्स डाउनलोड किए हैं।

भारत की बात करें तो यहां तकरीबन 50 करोड़ लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं। इनमें से महज 3 फीसद के पास ऐपल के फोन हैं, बाकी तकरीबन 97 फीसदी लोगों के पास अपने एंड्रॉयड फोन है। इनसे होने वाली बेहिसाब कमाई की दौड़ में गूगल आगे निकलना चाहता है। पिछले महीने गूगल ने इन ऐप बनाने वालों के लिए नया नियम बना दिया कि अगर उसके प्ले स्टोर से कोई ऐप बिकता है तो ऐप बनाने वाला प्रति ऐप तीस प्रतिशत कमीशन पहले तो गूगल की जेब में डालेगा। अब अगर मंडी में बैठकर माल बेचने वाला डिवेलपर तीस पर्सेंट कमीशन गूगल को ही दे देगा, तो वह भी पूछ रहा है कि उसके पास क्या बचेगा? मगर मोबाइल की ऐप्स मंडी पर एकछत्र राज करने वाली कंपनियां रोज ही डिवेलपर्स पर नए-नए नियम लादती जा रही हैं।

लेकिन अब इनकी मोनोपोली दरकती दिखाई दे रही है। वजह साफ है। मोबाइल बनाने वाली कंपनियां तो अपने मोबाइल के साथ अपना ही ऐप स्टोर बहुत पहले से दे रही थीं, मगर अब और भी कई खिलाड़ी इस फील्ड में हाथ आजमाने आगे आ रहे हैं। पेटीएम ने तो गूगल से हुए विवाद के बाद से ही अपना मिनी प्ले स्टोर शुरू कर दिया है। इसके अलावा भारत सरकार का भी एक ऐप स्टोर माय गॉव डॉट इन पर पहले से ही चल रहा है, जिसमें लगभग 1200 ऐप्स पहले से ही मौजूद हैं। इसी महीने की शुरुआत में खबर आई कि भारत सरकार अपना खुद का ऐप स्टोर लॉन्च करने जा रही है, ताकि स्टार्टअप्स को ऐपल और गूगल जैसी कंपनियों के चंगुल से बचाया जा सके। बता रहे हैं कि सरकार यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश में है कि मोबाइल बनाने वाली कंपनियां सरकारी ऐप स्टोर को मोबाइल में उसी तरह से इंस्टाल करके दें, जैसे कि वह गूगल या ऐपल के ऐप स्टोर्स देती हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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