नफरत करने की चीज नहीं है राजनीति

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लेखकः अवधेश कुमार
भारत के एक बड़े वर्ग में राजनीति को लेकर अजीब किस्म की हिकारत और वितृष्णा की भावना है। राजनीति पर चर्चा छिड़ते ही ऐसे लोग नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोल देते हैं कि राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं। क्या राजनीति को लेकर ऐसी सोच उचित और हितकर है और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए? वैसे राजनीति के प्रति दृष्टिकोण और व्यवहार कैसा हो, इसे लेकर विचार मंथन नया नहीं है। मनुष्य ने जबसे अपनी सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं के लिए स्वयं को किसी तरह की सत्ता के हवाले किया तबसे आरंभ हुआ यह मंथन मानव अस्तित्व कायम रहने तक जारी रहेगा। इस विषय पर विचार करते समय यह याद दिलाना जरूरी है कि अंग्रेजों के समय जनगणना में पेशा के कॉलम में स्वयं महात्मा गांधी ने राजनीति लिखा था। यानी गांधी जी को स्वयं को राजनीतिज्ञ या राजनेता मानने में कोई हिचक नहीं थी। इस संदर्भ में गांधी जी से बड़ा नाम किसका हो सकता है!

देश का पहला बजट
जिसे गांधी जी ने बेहिचक अपना पेशा बताया वह त्याज्य या न अपनाने वाला कर्म कैसे हो सकता है? अगर हम मनुष्य जीवन के विकास पर बिना कोई पूर्व धारणा थोपे नजर दौड़ाएं तो राजनीति घटिया नहीं बल्कि श्रेष्ठ कर्म लगेगी। भारत का ही इतिहास देखें तो जिन्हें हम महापुरुष का दर्जा देते हैं उनमें एक बड़ी श्रृंखला राजनीति करने वालों की है। वर्तमान भारत की जो तस्वीर है, उसके सकारात्मक पहलुओं में भी राजनीति की भूमिका स्पष्ट होती है। देश का पहला बजट 191 करोड़ का था। आज हम 30 लाख करोड़ के आसपास के बजट तक पहुंच रहे हैं। गांव-गांव में सड़कों का जो जाल बिछा है, उसमें क्या सरकारों की भूमिका नहीं है? सरकार ही क्यों, विपक्ष की भी राजनीति इसमें समाहित है। पिछले सात दशक से भी ज्यादा समय के विपक्ष के नेताओं की संसद, राज्य विधायिकाओं तथा सड़कों पर अपनाई गई भूमिकाओं का मूल्यांकन कैसे होगा? जनहित और देशहित की कितनी लड़ाइयां लड़कर विपक्ष ने हमारे-आपके कल्याण में भूमिकाएं निभाईं हैं, अगर इस पर कोई शोध हो तो विस्मित करने वाले निष्कर्ष सामने आएंगे।

इसमें दो राय नहीं कि हमारे देश के दोनों पक्षों के नेताओं ने निराश भी किया है। अपराधी, बेईमान, चरित्रहीन और नासमझ नेताओं के हाथों राजनीति का चरित्र हद दर्जे तक जन विरोधी, देश विरोधी हुआ है। राजनीतिक दलों के परिवारों के शिकंजे में जकड़ने की त्रासदी को कोई नकार नहीं सकता। जातियों, संप्रदायों की जकड़न तो कोढ़ में खाज के समान है। इन सबसे संवेदनशील, ईमानदार लोगों के अंदर यह भावना घर करना अस्वाभाविक नहीं कि राजनीति हमारे जैसे लोगों के लिए नहीं है। लेकिन सच कहें तो राजनीति के पतन या राजनीति की विकृति से कहीं ज्यादा खतरनाक है राजनीति से अपने को अलग रखने की प्रवृत्ति। वास्तव में यह भी हमारी वैचारिक विकृति ही है। आखिर इससे बड़ी आत्मघाती प्रवृत्ति क्या हो सकती है कि जिस राजनीति के हाथों में हमारी नियति निर्धारण की शक्ति है, उसी को नीच कर्म मानकर हम अपने को उससे अलग कर लें।

ऐसे महाज्ञानी लोग दूसरों को भी राजनीति में जाने से हतोत्साहित करते हैं। इन्हें नहीं पता कि ये स्वयं अपना और समाज का कितना बड़ा अहित कर रहे हैं। हालांकि, कोई प्रशासनिक या ऐसी अन्य समस्याएं आने पर ये उन्हीं के पास जाते हैं जिन्हें फालतू आदमी समझते हैं। अपने घर के सामने या आसपास सड़क पर गड्ढा भी हो जाए तो वे ऐसे लोगों से ही कहेंगे कि नेताजी इसे ठीक करा दो। अगर वही व्यक्ति एक छोटा चुनाव जीत जाए तो इनकी भाषा बदल जाती है। वास्तव में ऐसी मानसिकता को कमजोर किए जाने की जरूरत है। हम न भूलें कि इसी राजनीति में समझ-बूझ वाले संघर्षशील और ईमानदार लोग अब भी भारी संख्या में हैं। हम ऐसे लोगों से प्रेरणा क्यों न लें!

तात्पर्य यह कि हम एक ही पक्ष को न देखें। हम यह नहीं कहते कि हर व्यक्ति राजनीति करे। समाज व्यवस्था राजनीति पर जितनी कम निर्भर हो उतना ही अच्छा है। इसी तरह राजनीति का लगातार जीवन के हर क्षेत्र में बढ़ता हस्तक्षेप और प्रभाव भी चिंताजनक है। इससे धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक सभी क्षेत्रों में विकृतियां पैदा हुईं हैं। इनको आवश्यक न्यूनतम स्तर तक लाने की जरूरत है। निस्संदेह, भारत में व्यापक राजनीतिक सुधार की आवश्यकता है। किंतु यह भी राजनीति के माध्यम से ही हो सकता है। गांधी जी ने भी अपने जीवन के दर्दनाक अंत के एक दिन पूर्व कांग्रेस को भंग करने की बात अवश्य कही थी, लेकिन उन्होंने कार्यकर्ताओं को गांवों में जाकर काम करने की सलाह भी दी थी जो एक तरह की राजनीति ही थी। उन्होंने नए राजनीतिक दल के गठन से भी मना नहीं किया था। राजनीति की कटु आलोचना करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अंततः जनसंघ का गठन किया जिसकी उत्तराधिकारी बीजेपी है।

मिलना चाहिए प्रोत्साहन
वास्तव में आज आवश्यकता लोगों के अंदर समाज और देश के हित में सोचने की प्रवृत्ति पैदा करने और उन्हें राजनीति में सक्रिय होने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रेरित, प्रोत्साहित करने की है। यह दलीय राजनीति भी हो सकती है और गैर दलीय भी। पूरी संसदीय व्यवस्था से लेकर पंचायतों तक राजनीति को अयोग्य, बेईमान लोगों के हाथों से निकालकर पूरी व्यवस्था को भारतीय सोच के अनुरूप जनसरोकारी बनाने का यही एकमात्र रास्ता है। इसलिए राजनीति के वास्तविक अर्थ को समझें। उसे हिकारत के भाव से न देखें बल्कि श्रेष्ठ कर्म मानकर अपनाएं। जो लोग जिस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं या कर रहे हैं वे करें, लेकिन राजनीति में जाने वालों को हतोत्साहित न करें। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण के बाद समर्थकों और विरोधियों, दोनों श्रेणी के लोगों की राजनीति में अभिरुचि बढ़ना भारत के लिए एक शुभ संकेत है। जनहित के लक्ष्य से राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी अच्छे लोगों को राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित करते रहना चाहिए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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