नेपाल में पीएम ओली से निराश हुए लोग? उठ रही राजा को वापस लाने की मांग

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काठमांडू
नेपाल में इन दिनों सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में जारी घमासान का नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ रहा है। दो धड़ों में विभाजित पार्टी के एक गुट का नेतृत्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कर रहे हैं, जबकि उनके हर काम का विरोध पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन पुष्प कमल दहल प्रचंड कर रहे हैं। यही कारण है कि आज से 12 साल पहले 240 वर्षों की राजशाही को खत्म कर लोकतंत्र बनने वाले नेपाल में फिर से राजा की मांग उठ रही है।

12 साल में ही क्या लोकतंत्र से उबे लोग?
28 मई 2008 को नेपाल में राजशाही पूर्ण रूप से खत्म हो गई। तब सभी पार्टियों को मिलाकर गठित संविधान सभा को देश का एक नया संविधान बनाने का काम सौंपा गया था। नेपाली राजनीतिक दलों को संविधान का मसौदा तैयार करने में सात साल लगे। 2017 के चुनावों ने तत्कालीन सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन (माओवादी दलों) के कम्युनिस्ट गठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिला। बाद में इन सभी दलों ने मिलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल नाम की एक नई पार्टी बनाई। जो वर्तमान में देश पर शासन कर रही है।

सत्तारूढ़ पार्टी में ऐसे शुरू हुआ था बवाल
वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली फरवरी 2018 में दूसरी बार नेपाल की सत्ता में लौटे। इस बार उन्हें पूरे पांच साल शासन करने के लिए स्पष्ट जनादेश मिला हुआ था। शुरुआत के ढाई साल तो उनकी सत्ता आराम से चली, लेकिन इसके बाद पार्टी में आपसी कलह बढ़ता ही चला गया। कहा जाता है कि ओली और प्रचंड के बीच ढाई-ढाई साल तक प्रधानमंत्री रहने का समझौता हुआ था। लेकिन, ओली ने बाद में पद से हटने से साफ इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, वे पार्टी से बिना पूछे अपनी मनमर्जी से शासन को चलाने लगे। इसी कारण दोनों नेताओं के बीच विवाद बढ़ता चला गया।

काठमांडू में सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी
सत्तारूढ़ पार्टी में जारी घमासान का सबसे ज्यादा नुकसान देश को उठाना पड़ा। इसी दौरान कोरोना वायरस के कहर ने नेपाल के अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और रोजगार की कमर तोड़कर रख दी। बड़े पैमाने पर सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार भी देखने को मिला। यही कारण है कि देश में राजशाही समर्थक ताकतों ने फिर से सरकार के खिलाफ आंदोलन को तेज कर दिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में रैलियों को आयोजित करने के बाद, राजशाही समर्थक संगठनों ने सोमवार को काठमांडू में विरोध प्रदर्शन किया।

विशेषज्ञ बोले- प्रदर्शन का नहीं होगा खास असर
इस दौरान आंदोलनकारियों ने संघीय व्यवस्था को खत्म करने और राजा को देश को बचाने का नारा दिया। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि ऐसी बेतरकीब रैलियों से इन संगठनों को कुछ क्षणिक लाभ हो सकता है क्योंकि लोगों के मन में सरकार को लेकर निराशा बढ़ी है। लेकिन, इन प्रदर्शनों को अभी गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। लोग इतनी जल्दी फिर से राजशाही के पक्ष में खड़े नहीं होंगे।

नेपाल के कई शहरों में राजशाही के समर्थन में हुए प्रदर्शन
काठमांडू में विशाल रैली आयोजित करने से पहले राजशाही समर्थक और हिंदुत्व वादी प्रदर्शनकारियों ने हेटुडा, बुटवल, धनगढ़ी, नेपानगर, महेंद्रनगर, बरदिया, बिरजगंज, जनकपुर, नवापुर, पोखरा, रौतहट और बिराटनगर में इसी तरह की रैलियां आयोजित की थीं। राष्ट्रीय शक्ति नेपाल, गोरक्षा नेपाल, बिश्व हिंदू महासंघ, राष्ट्रीय सरोकार मंच, शिव सेना नेपाल, बीर गोरखाली और मातृभूमि समरसता नेपाल जैसे संगठन इन रैलियों में सबसे आगे रहे हैं।

नेपाल में राजशाही के लिए समर्थन जुटा रहे संगठन
काठमांडू में सोमवार की रैली को समन्वित करने वाले राष्ट्रीय शक्ति नेपाल के अध्यक्ष केशर बहादुर बिस्टा के अनुसार, उनके पास तीन प्रमुख एजेंडे हैं- संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना, नेपाल को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में बहाल करना और संघवाद को खत्म करना, क्योंकि यह लोगों को विभाजित करता है और राष्ट्र को खतरे में डालता है। बिस्टा ने कहा कि आम लोगों का बचना मुश्किल हो गया है, देश संकट में है। लेकिन, नेता राज्य को लूट रहे हैं।



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