पाकिस्तानी विपक्षी दलों के निशाने पर सेना

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लेखकः वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान की राजनीति अब फिर से गरमा रही है। जैसी उथल-पुथल हमने जनरल अयूब खान, याह्या खान और परवेज मुशर्रफ के खिलाफ कभी पाकिस्तान में देखी थी, लगभग वैसी ही उथल-पुथल की संभावनाएं अब बन रही हैं। पाकिस्तान की नौ प्रमुख पार्टियां एकजुट हो गई हैं। और एक साथ आकर वे किसी फौजी तानाशाह को हटाने के लिए कमर नहीं कस रही हैं बल्कि पाकिस्तान की फौज के खिलाफ ही उन्होंने नारा बुलंद कर दिया है। ये वे पार्टियां हैं, जिनके नेता पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रह चुके हैं। अभी पाकिस्तान में कोई फौजी तानाशाह काबिज नहीं है बल्कि चुनाव में जीता हुआ एक नेता प्रधानमंत्री है, जिसका नाम है- इमरान खान। इमरान खान पर विरोधी दलों का आरोप है कि पाकिस्तान की फौज ने उन्हें अपनी तिकड़म से चुनाव जिताया है और गद्दीनशीन किया है।

बिलावल की पहल
2018 के आम चुनाव में इमरान की पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीके-इंसाफ’ को कुल वोटों के एक-तिहाई वोट मिले लेकिन 149 जीती हुई सीटों के कारण वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई और उसने एक गठबंधन सरकार खड़ी कर ली। इमरान सरकार के खिलाफ ‘पाकिस्तान पीपल्स पार्टी’ के नेता बिलावल भुट्टो ने जिहाद छेड़ दिया है। बिलावल की पहल पर पाकिस्तान के लगभग सभी प्रमुख विरोधी दल एकजुट हो गए हैं। इन पार्टियों के संयुक्त सम्मेलन में लंदन से भाषण देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने फौज पर जैसा हमला बोला, वैसा आज तक पाकिस्तान में किसी बड़े नेता ने नहीं बोला था।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) की ओर से कराची में एक विरोध प्रदर्शन

अभी तक पाकिस्तान के नेता कभी फौज का नाम लेकर उसकी आलोचना नहीं करते थे। पाकिस्तान में फौज को नेता और पत्रकार अक्सर ‘प्रतिष्ठान’ या ‘एस्टैब्लिशमेंट’ कहकर संबोधित करते हैं, या यह भी कहते हैं कि वह ‘सरकार’ के अंदर सरकार’ है। लेकिन नवाज शरीफ ने अपने संबोधन में नया मुहावरा गढ़ दिया। उसे ‘सरकार के ऊपर सरकार’ कहा। नवाज शरीफ ने यह भी कहा कि विपक्ष की लड़ाई इमरान खान से नहीं बल्कि उस फौज से है, जिसने इमरान खान को गद्दी पर लाद रखा है। इमरान खान के विरुद्ध छेड़े हुए संग्राम का अर्थ अब होगा, पाकिस्तानी फौज के विरुद्ध सीधा संग्राम।

इसकी एक बानगी तो इसी घटना से मिली कि पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा की अकूत संपत्तियों की जांच की मांग खुलेआम की जा रही है। सेना की व्यापारिक गतिविधियों और भ्रष्टाचार पर विरोधी नेता जमकर बोल रहे हैं। विरोधी नेताओं के ऐसे बयानों को इमरान सरकार के मंत्री देशद्रोह की संज्ञा दे रहे हैं। पाकिस्तान में फौज के विरुद्ध जुबान खोलना देशद्रोह क्यों माना जाता है? इसके पीछे धारणा यह है कि यदि फौज है तो पाकिस्तान है। यदि फौज हाशिये में रहे, जैसे कि वह अन्य देशों में रहती है, तो पाकिस्तान बिखर जाएगा। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो मजहब के आधार पर बना है। यह फर्जी आधार सिर्फ डंडे के जोर पर ही जिंदा रह सकता है।

मजहबी आधार फर्जी होता है, इसीलिए बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हुआ। आज भी पाकिस्तान में सिंधी, बलूच, पख्तून और कश्मीरी अपने अलग राष्ट्र की मांग क्यों कर रहे हैं? पाकिस्तान में यों तो अयूब, याह्या, जिया और मुशर्रफ जैसे फौजियों का राज लंबे समय तक रहा लेकिन जब गैर-फौजी नेता प्रधानमंत्री रहे, तब भी देश की असली ताकत फौज के हाथों में ही रही। फौज के इशारों पर ही अदालतों ने जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और गिलानी जैसे प्रधानमंत्रियों को मुजरिम बनाया।

अब फौज के खिलाफ युद्ध की जो घोषणा हुई है, क्या वह सफल हो पाएगी? अभी जो तहरीके-जम्हूरियत बनी है, उसका नेता मौलाना फजलुर रहमान को बनाया गया है। वे जमीयते-उलेमा-इस्लाम के मुखिया हैं और पिछले साल उनकी पार्टी के प्रदर्शनों ने सरकार की नाक में दम कर दिया था। पाकिस्तान की राजनीति में मजहब की जबर्दस्त भूमिका को देखते हुए यह माना जाएगा कि एक मौलाना के नेतृत्व में कोई भी आंदोलन काफी लोकप्रिय हो सकता है। मौलाना अपने इस बहुदलीय आंदोलन को क्वेटा से छेड़ेंगे। सरकारी मंत्रियों का कहना है कि यह मौलाना अफगान आतंकवादियों का संरक्षक है और यह सेना का विरोध करके भारत की मदद कर रहा है।

इमरान सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कमर कस ली है। उसने नवाज शरीफ को लंदन से वापस लाने के लिए ब्रिटिश सरकार के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिए हैं। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी को अदालतों ने भ्रष्टाचार के दो नए मामलों में फिर से फंसा दिया है। वे पहले छह महीने की जेल काट चुके हैं। नवाज शरीफ के छोटे भाई शाहबाज शरीफ, जो पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, को भी सींखचों के पीछे डाल दिया गया है। नवाज की उत्तराधिकारी, उनकी बेटी मरियम को दुबारा जेल भेजने की तैयारी है। कोई आश्चर्य नहीं कि शीघ्र ही कुछ सिंधी, बलूच और पख्तून नेताओं को भी धर दबोचा जाए। अगले कुछ महीनों में जबर्दस्त खूंरेजी पाकिस्तान में हो सकती है।

चीनी सहारा कब तक
इमरान सरकार और फौज के खिलाफ यह जन-आंदोलन उस दौर में तेज हो रहा है, जबकि पाकिस्तान अपने जन्म के बाद सबसे गहरे संकट में फंसा हुआ है। कोरोना की महामारी ने उसको त्रस्त कर ही रखा है, इसके अलावा उसकी आर्थिक स्थिति भी बिगड़ती जा रही है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी उसे ठेंगा दिखा दिया है। अमेरिका ने अपना हाथ खींच रखा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय टास्क फोर्स का शिकंजा उस पर कसता चला जा रहा है। अकेला चीन इस लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को कब तक टेका लगाएगा? यदि इमरान सरकार संयम से काम नहीं लेगी और फौज के इशारों पर नाचेगी तो यह असंभव नहीं कि उसके गठबंधन में शामिल पार्टियां उससे किनारा करने लगें। इसका नतीजा यह भी हो सकता है कि इमरान सरकार के संसद में गिरते ही पीछे छिपी फौज एकदम आगे आ जाए और पाकिस्तान एक बार फिर फौज के बूटों तले सीधा रौंदा जाए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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