बगैर लोकतंत्र के कैसे कामयाब हो रहा चीन

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लेखकः भरत झुनझुनवाला
आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व चीनी दूतावास के एक प्रेस अधिकारी के साथ लंबी चर्चा हुई। अंत में उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं चीन को मित्र रूप में देखता हूं या शत्रु रूप में? मैंने उत्तर दिया- शत्रु रूप में। इसके बाद हमारा संवाद समाप्त हो गया। यह लेख लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य है कि हम अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति को समझें। इस समय चीन की भर्त्सना हांगकांग में लोकतंत्र को कुचलने को लेकर की जा रही है। यह सिलसिला 1989 में थ्येनानमन स्क्वेयर में लोकतंत्र समर्थकों की नृशंस हत्या के साथ शुरू हुआ था। उस समय से अमेरिकी विद्वानों का मंतव्य रहा है कि चीन में तानाशाही और बाजार के बीच मौलिक अंतर्विरोध है। यदि चीन को अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनानी है तो अंतत: उसे लोकतंत्र अपनाना ही पड़ेगा। लेकिन चीन बिना लोकतंत्र को अपनाए विश्व की नंबर 2 अर्थव्यवस्था बन गया है।

जनता के बीच वैधता
राजनीति शास्त्र में कहा जाता है कि जनता की दृष्टि में यदि शासक वैध है तो वह व्यवस्था स्थिर रहेगी। व्यवस्था के रूप का महत्व कम और जनता में वैधता के भाव का महत्व ज्यादा होता है। आइए समझें कि चीन के लोग वहां के तानाशाही शासन को किस रूप में देखते हैं। अमेरिका के एडेलमैन ट्रस्ट ने 2020 की रिपोर्ट में कहा कि चीन के 90 प्रतिशत लोगों को अपनी सरकार पर विश्वास है। इस मुकाबले भारत में 81 प्रतिशत लोगों को और अमेरिका में तो केवल 39 प्रतिशत लोगों को अपनी सरकार पर भरोसा है। इसी तरह चीन के 59 प्रतिशत लोगों को भय है कि वे संसार की चाल में पीछे छूट जाएंगे जबकि भारत के 73 प्रतिशत लोगों को ऐसा भय है। स्पष्ट है कि हमारी तुलना में चीन के लोग अपनी सरकार को ज्यादा संख्या में वैध और सफल मानते हैं।

हॉन्ग कॉन्ग में प्रदर्शन करते लोकतंत्र समर्थक

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एश सेंटर फॉर डेमोक्रेटिक गवर्नेंस ने बताया है कि वर्ष 2011 में चीन के 61 प्रतिशत लोग स्थानीय निकायों की नौकरशाही को दयावान मानते थे। पांच साल में यानी 2016 तक ऐसे लोगों का प्रतिशत 74 हो गया। 2011 में 44 प्रतिशत लोगों के अनुसार नौकरशाही को आम जन से सरोकार था जो 2016 में 52 प्रतिशत हो गया। 2011 में 45 प्रतिशत लोग नौकरशाही को अमीरों के हित साधने वाला मानते थे जो 2016 में घटकर 40 प्रतिशत रह गया। 2011 में 32 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नौकरशाही द्वारा गैरकानूनी वसूली की जाती है। 2016 में ऐसा कहने वालों का प्रतिशत 23 रह गया। स्पष्ट है कि चीन की नौकरशाही आमजन के प्रति सौहार्द रखती है और तानाशाह शी चिनफिंग के समय में इसमें सुधार हो रहा है।

‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ में छपे एक लेख के अनुसार चीन ने पिछले 20 वर्षों में नौकरशाही के चरित्र में मौलिक बदलाव किया है। नौकरशाहों को एक मापदंड के अंतर्गत पॉइंट दिए जाते थे जिनके अनुसार उनका प्रमोशन होता था। नौकरशाही पहले जड़ थी, जिसको पूर्व तानाशाह तंग श्याओफिंग ने एक ‘पूंजीवादी मशीन’ के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस संदर्भ में विचारणीय बात यह है कि अमेरिका अन्य देशों में लोकतंत्र पर इतना जोर क्यों देता रहा है। महाभारत के शांति पर्व अध्याय 108 में युधिष्ठिर कहते हैं, ‘गणतंत्र के शूर पुरुषों में परस्पर भेद ही नाश का कारण है।’ पुनः ‘गणराज्य के शूर आपस में चित्त की अनैक्यता के कारण शत्रुओं के वश में हुआ करते हैं।’ युधिष्ठिर के इन वाक्यों से समझ में आता है कि अमेरिका द्वारा भारत आदि देशों में जो गणतंत्र को पुरजोर तरीके से बढ़ाया जा रहा है उसका संभावित कारण उसकी यह इच्छा है कि भारत में फूट डालकर वह हमें अपने वश में कर सके।

इसलिए हमें लोकतंत्र के अमेरिकी आग्रहों का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। विशेषकर अमेरिका द्वारा जो चीन की लगातार निंदा की जा रही है, उससे बचना चाहिए। अमेरिका का पिछले 30 वर्षों का चीन का आकलन पूर्णतया गलत सिद्ध हुआ है। इन अवगुणों के बावजूद यह भी सत्य है कि लोकतंत्र में आम आदमी के मानसिक स्वातंत्र्य के कारण मानव समाज के विकास में भारी वृद्धि हुई है। लोकतंत्र के अंदर तमाम नए आविष्कार हुए हैं जिनसे मानव समाज आगे बढ़ा है। इसलिए हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोकतंत्र के खुलेपन के साथ चीन के सुशासन की वैधता को जोड़ दें।

यहां दो बातें प्रमुख दिखती हैं। पहली यह कि लोकतंत्र के अंतर्गत हमारे शासकों को विपक्ष के साथ गहरा संवाद करना चाहिए। संवाद करने से समाज में एक मन बनता है और जैसा युधिष्ठिर कहते हैं, आपसी फूट की संभावना कम हो जाती है। दूसरी बात यह कि अपने देश में नौकरशाही का चरित्र चीन के ठीक विपरीत दिखता है। हमारी नौकरशाही द्वारा की जा रही लूट में शामिल होने के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की जा रही है। सरकारी शिक्षकों के बिना कार्य किए उच्च वेतन पाने से हमारा शिक्षा तंत्र ध्वस्त हो चुका है और हम तकनीकों में पीछे होते जा रहे हैं। नौकरशाही को भारी वेतन देने के कारण देश अंतरिक्ष आदि क्षेत्रों में निवेश नहीं कर पा रहा है और हमारा जीडीपी धीमा पड़ रहा है। न्यायालयों की नौकरशाही के चलते आम आदमी को न्याय नहीं मिल रहा है।

नौकरशाही में सुधार
यदि हम अपनी नौकरशाही में चीन की तरह सुधार कर लें और इसे जन सेवा की तरफ मोड़ सकें तभी अपने देश में लोकतंत्र का औचित्य बनता है। वर्तमान स्थिति में हमारा लोकतंत्र न तो जनहित हासिल कर रहा है और न ही हमको विदेशियों द्वारा आपस में फूट डालने से बचा पा रहा है। यही वक्त है जब हमें अपने लोकतंत्र का मौलिक रूपांतरण करने पर विचार करना चाहिए। अमेरिका द्वारा प्रसारित की जा रही चीन की निंदा से बचते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी की सही स्थिति को समझना चाहिए और स्वयं अमेरिका में लोकतंत्र की दुरूह होती स्थिति का संज्ञान लेना चाहिए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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