बिहार चुनाव में एक इम्तिहान यह भी होना है

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बिहार का चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए इस बात का भी फैसला होगा कि राज्य में अलग-अलग जमातों की नुमाइंदगी करने वाले दो बड़े नेताओं- लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने-अपने बेटे को सौंपने का जो काम किया है, उस पर जनता अपनी मुहर लगाती है या नहीं? लोकतंत्र में नेताओं की इच्छाएं ही काफी नहीं होती हैं, उसमें ‘लोक’ की सहमति जरूरी होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो बेटे होने के चलते चौधरी अजित सिंह अपने पिता चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत के स्वाभाविक वारिस होते और आज की तारीख में वे उत्तर भारत के सबसे बड़े किसान नेता होते। लेकिन ‘लोक’ के जरिए ऐसा मुमकिन नहीं हुआ। वे वेस्ट यूपी के कुछ गिने-चुने जिलों के, वह भी एक खास जाति के ही नेता बन सके, और आज की तारीख में उन जिलों में भी उन्हें अपनी साख बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

तेजस्वी यादव और चिराग पासवान

बिहार में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान, दोनों के राजनीतिक जीवन का यह पहला चुनाव होगा, जिसमें वे अपनी पार्टी का चेहरा बनकर और अपने-अपने पिता की राजनीतिक विरासत की छतरी लगाकर चुनावी मैदान में हैं। दोनों के पिताओं ने अपने बेटों को घोषित तौर पर अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया है। दोनों ही युवा हैं, और संयोग यह कि दोनों ही राजनीति से हटकर अपना करियर चुनना चाहते थे। तेजस्वी की इच्छा जहां क्रिकेटर बनने की थी, वहीं चिराग बॉलिवुड में अपनी किस्मत आजमाना चाहते थे। पिता होने के चलते लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने तमाम कोशिश भी कीं कि उनके बेटे अपनी पसंद की जिंदगी जी सकें। लेकिन उन्हें उतनी कामयाबी नहीं मिल सकी, जिसकी उम्मीद वे कर रहे थे। ऐसे में उन्हें अपने बेटों को राजनीति में आने और भविष्य में राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए राजी करना पड़ा। लालू के जेल जाने के बाद तेजस्वी उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हुए। उधर अपने खराब होते हुए स्वास्थ्य को देखकर रामविलास पासवान समझ गए थे कि उनकी जिंदगी बहुत दिनों की नहीं है। ऐसे में उन्होंने पिछले साल नवंबर में ही चिराग को पार्टी की कमान सौंप दी थी।

राजनीतिक विरासत की मुश्किल
राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी बनना कोई आसान काम नहीं होता। ऐसा कोई उदाहरण नहीं देखा गया है कि कोई नेता जिस ‘वोट बैंक’ का ‘मालिक’ होता है, वह ‘वोट बैंक’ उसके उत्तराधिकारी को अपने आप ट्रांसफर हो गया हो। दरअसल राजनीतिक उत्तराधिकारी के लिए मुश्किल की शुरुआत यहीं से होती है। नेता की जिन खूबियों की बदौलत उसका ‘वोट बैंक’ तैयार होता है, वह ‘वोट बैंक’ उन्हीं खूबियों को उसके उत्तराधिकारी में भी कदम दर कदम तलाश करता है। वह उत्तराधिकारी को भी उसी कसौटी पर कसना चाहता है, जिस पर कस कर उसने किसी राजनीतिक शख्सियत को अपना नेता स्वीकारा था। ऐसे बहुत सारे मानक होते हैं जो भले ऑन रिकॉर्ड किसी को दिखाई न पड़ें लेकिन ‘लोक’ के जेहन में वे चल रहे होते हैं। यूपी में मुलायम सिंह यादव की जन सभाओं में आज भी यह नारा गूंजता है, ‘धरती पुत्र मुलायम सिंह’, ‘जिसने कभी न झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम है।’ लेकिन यह नारा अभी अखिलेश यादव की सभाओं में नहीं सुनाई पड़ता है। जाहिर सी बात है कि बिहार में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान को भी इसी तरह की कसौटियों से गुजरना होगा। लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान यूं ही इतने बड़े कद के नेता नहीं बन गए थे और न ही कुछ दिन या कुछ महीने में उन्होंने अपना यह जनाधार तैयार किया था। वे एक लंबे सफर के बाद यहां तक पहुंचे। तेजस्वी और चिराग को अपना जनाधार तैयार करने के लिए वह मेहनत तो नहीं करनी होगी, जो उनके पिताओं ने की थी। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि मिले हुए जनाधार को सहेज कर रख पाना, कहीं बड़ी चुनौती होती है।

पब्लिक है, सब जानती है
राजनीतिक विरासत के नतीजे मिले-जुले रहे हैं। वैसे नई पीढ़ी के नेताओं को जगन मोहन रेड्डी से सबक लेना चाहिए, जहां उन्होंने अपने मुख्यमंत्री पिता की मौत के बाद विपरीत परिस्थितियों में अपने को न केवल आंध्र प्रदेश की राजनीति में स्थापित किया, बल्कि अपनी खुद की बनाई पार्टी को सत्ता में लाने और मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। ओडिशा में नवीन पटनायक और यूपी में मायावती के भी उदाहरण हैं, जहां उन्होंने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में अपनी कामयाबी की इबारत लिखी। हरियाणा में देवीलाल की राजनीतिक विरासत तीसरी पीढ़ी तक आते-आते बिखर गई। कई मामलों में जनता का फैसला बहुत दिलचस्प रहा है, जहां किसी एक नेता की विरासत के हक के कई दावेदार खड़े हुए। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की राजनीतिक विरासत को लेकर उनकी पत्नी लक्ष्मी पार्वती और दामाद चंद्रबाबू नायडू के बीच जंग छिड़ी, तो जनता ने चंद्रबाबू नायडू को उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार किया। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत के लिए उनके बेटे उद्धव और भतीजे राज के बीच पाला खिंचा, तो बाल ठाकरे के फॉलोअर्स ने उनके बेटे उद्धव को चुना। यूपी में एक क्षेत्रीय पार्टी हुआ करती है- अपना दल। इसके संस्थापक डॉ. सोने लाल पटेल की मौत के बाद उनकी राजनीतिक विरासत के लिए उनकी पत्नी और उनकी बेटी के बीच जंग छिड़ी। उनके वोट बैंक का फैसला बेटी अनुप्रिया पटेल के पक्ष में गया, जो कि मोदी की 2014-19 की सरकार में केंद्रीय मंत्री रही हैं और इस वक्त भी उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है। तमिलनाडु में जयललिता की राजनीतिक विरासत पर अगले साल जनता अपना फैसला सुनाएगी।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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