बिहार में बज गया चुनावी बिगुल: इन 8 मुद्दों पर नेता एक-दूसरे पर करेंगे वार-पलटवार

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पटना
बिहार में विधानसभा चुनाव (bihar election 2020) का ऐलान हो चुका है। सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग की ओर से तय की गई तारीखों का स्वागत किया है। चुनाव की घोषणा होने के साथ ही बिहार के वोटरों के मन में पहला सवाल यही आएगा कि आखिर चुनावी मुद्दा क्या होगा। पिछले एक महीने के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषणों पर गौर करें तो उससे मुद्दों को लेकर काफी कुछ तस्वीरें साफ हो जाती है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में किन आठ मुद्दों (Bihar assembly election issues) पर सत्ता पक्ष और विपक्ष जनता का वोट हासिल करने की कोशिश करेंगी।

बेरोजगारी

हालिया 10-15 साल के दौरान हुए लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो बेरोजगारी के मुद्दे को शायद ही किसी राजनीतिक दल ने तवज्जों दिया हो। ज्यादातर चुनावों में नेताओं के ऊपर निजी हमले, साम्प्रदायिक रंग, आरक्षण, विकास आदि की बातें मुद्दे बनते रहे हैं। लंबे समय बाद बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल आरजेडी बेरोजगारी को मुद्दा बनाने की कोशिश में है। दरअसल, कोरोना वायरस की वजह से लागू हुए देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से बिहार में करीब 26 लाख युवा लौटे हैं। इन लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। इसमें से ज्यादातर बेरोजगार 30 साल ऐज ग्रुप के हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बेरोजगारी को मुद्दा बनाने की कोशिश में हैं। इसके लिए उन्होंने एक वेबसाइट भी लांच किया है। इस वेबसाइट पर कुछ ही घंटों में पांच लाख से ज्यादा युवा बेरोजगारों ने रजिस्ट्रेशन कर लिया था। दावा किया गया है कि आरजेडी सत्ता में आई तो इन बेरोजगारों को रोजगार दिया जाएगा। इसके अलावा बेरोजगारी के खिलाफ लालटेन और दीया जलाने का अभियान भी चलाया था।

कृषि सुधार बिल

केंद्र सरकार ने संसद में कृषि सुधार बिल पास किया है। यह चुनाव का तात्कालिक मुद्दा बना है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और उनके भाई तेजप्रताप यादव इसके विरोध में ट्रैक्टर पर बैठकर जनसैलाब के साथ विरोध प्रदर्शन किया है। कांग्रेस भी इस मुद्दे को जोर शोर से उठा रही है। कृषि सुधार बिल का एनडीए की सहयोगी दल शिरोमणी अकाली दल (शिअद) भी विरोध कर रही है। यहां तक की शिअद सरकार से भी अलग हो गई है।

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा

पिछले दो चुनावों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करते देखे गए थे, लेकिन बीजेपी के साथ दोबारा गठबंधन होने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को भूला दिया है। अब आरजेडी इस मुद्दे का थाम चुकी है। आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव लगातार कह रहे हैं कि वह बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई को जारी रखेंगे। विशेष राज्य के दर्जा दिलाने के मुद्दे को लेकर नीतीश कुमार दिल्ली और पटना में रैलियां कीं, हस्ताक्षर अभियान चलाया था, लेकिन अब वह इसे भूल चुके हैं।

कोरोना और बाढ़ राहत

कोरोना काल और बाढ़ के दौरान केंद्र सरकार के सहयोग से बिहार सरकार ने ग्रामीण इलाकों में मुफ्त अनाज बांटे हैं। इसके अलावा नकदी भी खाते में भेजे गए हैं। जबकि विपक्षी पार्टियां आरोप लगा रही हैं कि इसमें धांधली हुई है। साथ ही आरजेडी नेता तेजस्वी यादव आरोप लगाते रहे हैं कि बाढ़ राहत के नाम पर सरकार ने कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं एनडीए के घटक दल एलजेपी भी कोरोना और बाढ़ राहत में कमी को लेकर नीतीश सरकार पर सवाल उठाती रही है।

डबल ईंजन की सरकार

एनडीए खेमा डबल ईंजन की सरकार को मुद्दा बनाती दिख रही है। एनडीए के सारे बड़े नेता अपने भाषणों में डबल ईंजन की बात करते हैं। चुनाव की घोषणा से ठीक पहले पीएम मोदी ने बिहार को कई हजार करोड़ रुपये की योजनाएं दी हैं। एनडीए के नेता विकास और सुशासन के मुद्दे को जोरशोर से उठा रहे हैं।

नीतीश बनाम तेजस्वी

बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा भी बड़ा मुद्दो साबित हो सकता है। एनडीए खेमा का चेहरा सुशासन बाबू कहे जाने वाले नीतीश कुमार हैं, वहीं विपक्ष में तेजस्वी यादव हैं। अनुभव के हिसाब से दोनों चेहरों में बड़ा अंतर है। इसके अलावा नीतीश कुमार की साफ सुथरी छवि है, वहीं तेजस्वी यादव और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। खुद की परिवार से अलग छवि गढ़ने के लिए तेजस्वी यादव ने चुनाव पोस्टरों से पिता, मां, बहन सभी भी हटा दिया है। एनडीए खेमा इसी को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है।

एंटी इनकंबेंसी

नीतीश कुमार करीब 15 साल से राज्य की सत्ता पर कायम हैं। इस वजह से जेडीयू लालू फैमिली के 15 साल बनाम नीतीश के 15 साल की तुलना कर रही है। यह जंग पोस्टरों में साफ तौर से दिख रहा है। लेकिन राजनीति के जानकार मानते हैं कि 15 साल तक एक ही नेता के हाथ में सत्ता होने से जनता का एक बड़ा तबका परिवर्तन की चाहत पालने लगता है। हालांकि उसमें यह भी देखना जरूरी होता है कि जनता के सामने विकल्प क्या हैं। कई बार विकल्प कमजोर हो तो एंटी इनकंबेंसी का मुद्दा दब जाता है। एनडीए के घटक दल एलजेपी भी नीतीश कुमार को लेकर एंटी इनकंबेंसी की बात करती रही है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में जिक्र करते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार ही गठबंधन का चेहरा हैं।

सुशांत सिंह राजपूत, हरिवंश, रघुवंश प्रसाद

इस बार के विधानसभा चुनाव प्रचार में नेताओं की जुबान पर सुशांत सिंह राजपूत, हरिवंश, रघुवंश प्रसाद जैसे नाम दिखेंगे। एनडीए खेमा इसे जोरशोर से उठा रहा है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की सीबीआई जांच को एनडीए खेमा अपनी उपलब्धी बता रहा है। वहीं आरजेडी के वरिष्ठ नेता को लेकर तेज प्रताप यादव का एक लोटा पानी वाले बयान को भी एनडीए खेमा जोर शोर से प्रचारित कर रहा है। इसके अलावा संसद में डिप्टी चेयरमैन हरिवंश के साथ विपक्षी नेताओं की बदतमीजी को भी एनडीए जनता तक ले जा रही है। खास बात यह है कि ये तीनों चेहरे राजपूत समाज से आते हैं। इस लिहाज से भी एनडीए खेमे को यह सूट कर रहा है।



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