भारत के इलाकों को नेपाल का बताने वाली किताब पर नेपाल सरकार ने लगाई रोक

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हाइलाइट्स:

  • इस किताब में भारत के कई इलाकों को भी नेपाल का हिस्सा बताया गया है
  • सेकंडरी स्कूल के लिए इस रेफरेंस बुक में नेपाल की सीमा की दी गई है जानकारी, लेकिन गलत
  • नेपाल के एजुकेशन मिनिस्टर ने की थी किताब रिलीज, खुद ही लिखी है किताब की प्रस्तावना
  • नेपाल की लैंड मैनेजमेंट मिनिस्ट्री ने जताई आपत्ति, कहा किताब में हैं कई तथ्यात्मक गलतियां

नई दिल्ली
नेपाल सरकार ने फिलहाल इस विवादित किताब के वितरण पर रोक लगा दी है, जिसमें भारत के कई इलाकों को भी नेपाल का हिस्सा बताया गया है। नेपाल की एजुकेशन मिनिस्ट्री ने कुछ दिन पहले इस विवादित किताब को लॉन्च किया था और इसे सेकंडरी स्कूल के स्टूडेंट्स के लिए रेफरेंस बुक कहा गया था। अब नेपाल कैबिनेट का कहना है कि इस किताब में कई तथ्यात्मक गलतियां हैं और कुछ अनुचित कॉन्टेंट भी है।

नेपाल कैबिनेट ने एजुकेशन मिनिस्ट्री से कहा है कि इस किताब का वितरण रोका जाए और इसकी और कोई कॉपी प्रिंट न की जाएं। नेपाल की लैंड मैनेजमेंट मिनिस्ट्री और फॉरेन मिनिस्ट्री ने इस किताब के कॉन्टेंट पर आपत्ति दर्ज कराई थी।

नेपाल के एजुकेशन मिनिस्टर गिरिराज मनी पोखरेल ने 15 सितंबर को 110 पेज की यह किताब ‘सेल्फ स्टडी मटीरियल ऑन नेपाल्स टेरिटरी एंड बॉर्डर’ रिलीज की। इसमें मुख्य तौर पर भारत के साथ नेपाल के सीमा विवाद का जिक्र है और बताया गया है कि भारत के कई इलाके नेपाल का हिस्सा हैं।

इस किताब में नेपाल का नया एरिया 147,641.28 स्क्वायर किलोमीटर दिखाया गया है, जिसमें 460.28 स्क्वायर किलोमीटर एरिया कालापानी का है। नेपाल के नए पॉलिटिकल मैप में भी भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिम्पयाधुरा एरिया को अपना बताया गया है। इस किताब की प्रस्तावना खुद नेपाल के एजुकेशन मिनिस्टर ने लिखी है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि किस तरह उन्होंने 24 साल पहले कालापानी, लिुपलेख और लिम्पयाधुरा से भारतीय सेना को हटाने के लिए कैंपेन किया था।

नेपाल के सीनियर पॉलिटिकल जर्नलिस्ट बिनोद घीमीरे ने एनबीटी से बात करते हुए कहा कि जो नया मैप नेपाल सरकार ने जारी किया था वही इस किताब में भी है लेकिन लगता है कि पॉलिटिकल सर्कल में इस किताब की प्रस्तावना पर ज्यादा आपत्ति है, जिसमें अनडिप्लोमेटिक भाषा का इस्तेमाल किया गया है।

लैंड मैनेजमेंट मिनिस्ट्री का भी कहना है कि इसमें 35 जगहों पर गलत और असंवेदनशील टिप्पणी की गई है। मिनिस्ट्री के मुताबिक अभी कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख का पूरा एरिया का नाम अब तक पब्लिश नहीं किया है और उससे पहले ही किताब छापना ठीक नहीं है।

बिनोद घीमीरे ने कहा कि यह लगता है कि इस किताब से विदेश मंत्रालय भी खुश नहीं है क्योंकि यह डिप्लोमेसी के लिहाज से भी सही नहीं है। नेपाल में कई एक्सपर्ट्स भी इस किताब के छापने के वक्त को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उनके मुताबिक ज्यादातर एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे वक्त में जब भारत-नेपाल के बीच डिप्लोमेटिक बातचीत कई महीनों से रुक गई थी, ऐसे में इस तरह का कदम भारत-नेपाल के बीच रिश्ते खराब करने वाला होगा। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने इस किताब पर रोक लगाकर इसका ख्याल रखा है कि भारत-नेपाल के बीच रिश्ते खट्टे न हों।



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