महामारी को महामंदी न बनने दें दुनिया के नेता

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अमेरिका में सभी राज्य सरकारों को अक्टूबर के अंत तक व्यापक कोरोना वैक्सिनेशन अभियान के लिए तैयार रहने को बोल दिया गया है। रूस, चीन और कुछ यूरोपीय देशों में भी नवंबर की किसी तारीख से बड़े पैमाने का टीकाकरण शुरू हो सकता है। भारत में कोरोना वैक्सीन को लेकर अपनी रिसर्च भी काफी आगे बढ़ गई है, पर हमारी खासियत है दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माण क्षमता, जिसका लाभ उठाने के लिए लगभग हर बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी भारत सरकार से संवाद में है। काफी संभावना है कि अक्टूबर के एडवांस्ड ट्रायल में जिस भी वैक्सीन के नतीजे सबसे अच्छे होंगे, वह भारत में बनने लगेगी और दीवाली (14 नवंबर 2020) तक देश में आधार-बेस्ड टीकाकरण की चर्चा जोरों पर होगी।

वैक्सीन की मुश्किलें
अलबत्ता लोगों की उम्मीदें बेकाबू न हों, इसके लिए कोरोना वैक्सीन से जुड़ी कुछ मुश्किलें गिनाना जरूरी है। पहली तो यही कि जितनी जल्दबाजी में ये वैक्सीनें लाई जा रही हैं, उसे देखते हुए इनकी सफलता का प्रतिशत 50 से 70 के बीच ही रहने की उम्मीद है। कुछ समय पहले दिल्ली में हुए एक सेरोसर्वे ने इसमें शामिल कोई एक चौथाई लोगों में कोरोना वायरस की एंटीबॉडीज दर्ज की थीं। यानी कोई लक्षण दिखाए बगैर उन्हें यह बीमारी होकर ठीक भी हो चुकी थी। बाकी तीन चौथाई या तो संक्रमित थे या संक्रमण से बचे हुए थे। बड़े पैमाने के संक्रमणों में समय के साथ एंटीबॉडीज विकसित कर लेने वालों का प्रतिशत बढ़ता है, लिहाजा बिल्कुल संभव है कि यही सर्वे नवंबर मध्य तक पूरे देश में कराया जाए तो आधे से भी ज्यादा लोग कोरोना वायरस से सुरक्षित पाए जाएं।

ऐसे में 50 प्रतिशत सफलता वाली कोरोना वैक्सीन क्या नया कमाल दिखाएगी? अलबत्ता 70 प्रतिशत सफलता वाली वैक्सीन के नतीजे बेहतर होंगे, पर लोगों का इत्मीनान से घूमना-फिरना तब भी शायद ही हो पाएगा। एक समस्या वैक्सीन निर्माण के पैमाने की भी है, जिसकी एक अरब से ज्यादा डोज 2020 बीतने तक नहीं बनाई जा सकती। पूरी दुनिया के लिए जरूरी आठ अरब डोज 2021 के मध्य तक ही बन पाएगी, बशर्ते कई तरह की वैक्सीनों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हो। इसके लिए जरूरी शीशियों, सिरिंजों का इंतजाम भी कोई मामूली समस्या नहीं है, फिर भी वैक्सीन के भंडारण और वितरण से जुड़ी सारी समस्याएं हल कर ली जाएं और टीकाकरण को बहुत तेजी से अंजाम दिया जाए, तब भी अभियान पूरा होने तक 2021 और शायद 2022 के भी कुछ महीने लग जाएंगे। इस दौरान, बल्कि इसके बाद भी लोगों का सामाजिक व्यवहार बीमारी के रुझानों पर निर्भर करेगा।

पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों में, मसलन स्पेन और फ्रांस में मध्य मार्च से मई अंत तक रोजाना औसतन पांच हजार केस आए। फिर जून की शुरुआत से मध्य जुलाई तक यह औसत एक हजार पर आ गया तो मान लिया गया कि बीमारी खत्म होने की ओर है। लेकिन अगस्त शुरू होते ही मामले फिर चढ़ने शुरू हो गए और दोनों देशों में संख्या पांच से दस हजार रोजाना दर्ज की जाने लगी। ऐसा कोई उतार-चढ़ाव वैक्सिनेशन के बाद भी देखा गया तो लोगों का चाल-चलन बहुत लंबे समय के लिए बदल जाएगा। मसलन, भारत जैसे देश में लोगों के सिनेमा हॉल में बैठकर फिल्म देखने या एक-दूसरे को रगड़ते हुए बाजार घूमने या ट्रेनों में ठुंसकर सफर करने की बात सपना हो जाएगी।

दुनिया की इकनॉमिक रिकवरी काफी हद तक निकट भविष्य में लोगों के सामाजिक व्यवहार पर ही निर्भर करेगी। अभी इस बारे में सारे आकलन हवाई हैं। जून के अंत में आईएमएफ का अनुमान सन 2020 के लिए विश्व अर्थव्यवस्था में 4.6 फीसदी की गिरावट का था। अभी हर देश से आए खराब आंकड़ों के बावजूद इसे सुधार कर 4.4 फीसदी गिरावट पर ला दिया गया है। अनुमान सुधरने का कारण चीन की जीडीपी में 2.7 फीसदी वृद्धि की संभावना और अमेरिका में नौकरियों के बेहतर आंकड़े हैं। पूरी दुनिया के शेयर बाजार आज भी वी शेप्ड रिकवरी (तीखी गिरावट, फिर वैसी ही तीखी चढ़ान) की उम्मीद में चढ़े हुए हैं। यह उम्मीद पूर्वी एशिया, यानी जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और छिटपुट अन्य अर्थव्यवस्थाओं में तेज उछाल की संभावना पर टिकी है, क्योंकि इस इलाके में बीमारी शुरू के दो महीनों में ही ठहर गई थी। लेकिन अभी इनमें किसी के आर्थिक नतीजे अच्छे नहीं आ रहे, क्योंकि कहीं थोड़ी भी ढील पाकर बीमारी बढ़ जा रही है।

सवाल यह है कि ऐसा हाल कब तक रहेगा? विश्व अर्थव्यवस्था या राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जैसी भी दिखे, कंपनियों का रुझान कैसा होगा? नौकरियां और तनख्वाहें आने वाले दिनों में कुछ बढ़ेंगी, या जो रही-सही बची हैं वे भी जाएंगी? इन सवालों का जवाब दो स्तरों पर खोजा जा सकता है। कंपनियों को पिछले कुछ महीनों से कर्ज अदायगी और सस्ते कर्जों के रूप में, साथ में छोटी-मोटी अन्य सरकारी सहायताओं के रूप में जो सपोर्ट मिला हुआ है, वह अब महीनों का नहीं, दिनों का मेहमान है। जिंदा रहने के लिए लोगों को मिलने वाले सस्ते अनाज और कुछ रुपयों की व्यवस्था भी छह महीने के लिए ही है। बिहार में वोट पड़ते ही यह चली जाएगी। ऐसे में कंपनियों के लिए और आम आदमी के लिए भी इस बार के दशहरा-दीवाली कुछ एं-वें से ही रहेंगे।

पिछली मंदी से अलग
रही बात बड़े बदलावों की तो उनका इंतजाम कोरोना के पहले से ही हुआ पड़ा है। हमने 2008-09 की मंदी देखी है, जब विश्व अर्थव्यवस्था में 2.2 पर्सेंट की गिरावट आई थी। इस साल इसकी दोगुनी गिरावट की बात ऊपर कही जा चुकी है। बाजार सिकुड़ा हुआ है, लेकिन पश्चिमी देशों का वित्तीय ढांचा तब जिस तरह ढहा था, वैसा कुछ आज नहीं है। दुनिया आर्थिक गिरावट से ऊपर उठ सकती है और उठेगी, लेकिन कितने समय में? पिछली बार की तरह दो-तीन साल में तो हरगिज नहीं, क्योंकि अभी हर देश की नीति औरों की कीमत पर अपना हित साधने की है। ग्लोबलाइजेशन के बाद से सारे देश अपना 10 से 30 प्रतिशत उत्पादन बाहर बेचने के लिए कर रहे हैं। इसमें कटौती हर देश, हर कंपनी की ग्रोथ को भारी नुकसान पहुंचाएगी। राजनीतिक-आर्थिक नेताओं के सामने चुनौती इस बात की है कि वे महामारी को महामंदी की शक्ल न लेने दें।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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