ये हैं बिहार चुनाव के ‘भीष्म पितामह’, रण में महागठबंधन खेमे के हैं योद्धा लेकिन इनका अर्जुन कौन?

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पटना
बिहार विधानसभा चुनाव इस बार पूरी तरह से महासंग्राम में तब्दील होता दिख रहा है। हमारे समाज में युद्ध और महासंग्राम की बात आते ही जेहन में पहला नाम महाभारत का आता है। हम भारतीयों के लिए महाभारत केवल ग्रंथ मात्र नहीं है, बल्कि यह समाज और परिवार में होने वाले तमाम विवाद का हल ढूंढने का मार्ग भी बताता है। महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच हुआ था। बिहार चुनाव रूपी संग्राम में भी मुख्य रूप से दो खेमे हैं, एक महागठबंधन दूसरा एनडीए। हालांकि यह लोकतंत्र का महाभारत है इसलिए यहां नैतिक-अनैतिक या पांडव और कौरव जैसी कोई बात नहीं है। हां इतना जरूर है कि इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भी महाभारत की ही तरह लोग कर्मयुद्ध कर रहे हैं। यानी सभी अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं। अब अगर बिहार विधानसभा चुनाव में महाभारत की बात हो रही है तो सवाल उठना लाजमी है कि इस रण में भीष्म पितामह कौन हैं। बिहार की मौजूदा राजनीतिक हालात पर नजर डालें तो भीष्म पितामह के रोल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह नजर आते हैं। अब आप सोचने लगे होंगे कि आखिर सदानंद सिंह की तुलना भीष्म से क्यों, तो आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

सदानंद कैसे बने हैं बिहार की राजनीति के भीष्म पितामह

महाग्रंथ महाभारत के मुताबिक मां गंगा के पुत्र भीष्म पितामह कौरव और पांडव दोनों खेमे को मिलाकर सबसे बुजुर्ग और अनुभवी योद्धा थे। लेकिन सत्ता, साम्राज्य और अधिकारों के लिए परिवार के लोग कौरव और पांडव के रूप में दो खेमों में बंट गए। परिवार में जब ये सब हो रहा था उस दौरान भी भीष्म पितामह का मन नहीं डोला, वह पांडवों को सही मानते थे लेकिन नैतिकता को बरकरार रखते हुए उन्होंने कौरवों की तरफ से युद्ध किया। महाभारत की पूरी कहानी को देखें तो भीष्म पितामह का कैरेक्टर नैतिकता और किसी भी परिस्थिति में अपने कर्मों का पालन सही तरीके से करने वाले नजर आते हैं। मौजूदा दौर की राजनीति में सदानंद सिंह का कैरेक्टर भी कुछ हद तक इसी तरह का है।

कुछ भी हो जाए कांग्रेस में ही बने रहे सदानंद सिंह

75 वर्षीय सदानंद सिंह बिहार के उन गिने-चुने नेताओं में से एक हैं जिनके राजनीतिक करियर की शुरुआत भी कांग्रेस के साथ हुई और शायद अंत भी इसी पार्टी में होगी। 1990 के दौर में बिहार में इस पार्टी का पतन शुरू हुआ तब खांटी माने जाते रहे कांग्रेसी भी पाला बदलकर आरजेडी, जेडीयू या बीजेपी में चले गए। लेकिन सदानंद सिंह पार्टी के प्रति अपनी नैतिकता को बनाए रखते हुए उसी में बने रहे। पार्टी ने भी उन्हें इसके इनाम स्वरूप लंबे समय तक राज्य में प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा।

आरजेडी का हमेशा से मुखालफत करते रहे सदानंद सिंह

खास बात यह है कि सदानंद सिंह बिहार कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जो कभी भी आरजेडी को पसंद नहीं करते हैं। कई बड़े मौके आए जब सदानंद सिंह आरजेडी के साथ गठबंधन का विरोध करते रहे। साल 2000 के विधानसभा चुनाव के बाद आरजेडी को सरकार बनाने के लिए थोड़ी बहुत सीटों की दरकार थी, तब सदानंद सिंह, कृष्णा शाही सरीखे नेताओं ने राबड़ी देवी की सरकार बनाने में सहयोग देने से साफ मना कर दिया था, लेकिन केंद्र में मौजूदा कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फैसले को पलट दिया। इस तरह राज्य में ना चाहते हुए भी आरजेडी और कांग्रेस की साझा सरकार बनी। हालांकि कि बाद में इस सरकार के दौरान सदानंद सिंह विधानसभा अध्यक्ष बने।

बिहार में कांग्रेस के अकेले लड़ने की बात करते रहे हैं सदानंद सिंह

2005 के विधानसभा चुनाव में राज्य में आरजेडी की सत्ता उखड़ने के बाद भी सदानंद सिंह हमेशा से कांग्रेस को अकेले राज्य के चुनाव में उतरने की सलाह देते रहे। 2009 के लोकसभा चुनाव और 2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व एक बार फिर से आरजेडी का साथ देना चाहती थी, लेकिन लालू प्रसाद यादव ने ही इस पार्टी को तवज्जो नहीं दिया। हालांकि उस दौरान सदानंद सिंह इस बात से खुश थे कि कांग्रेस ने राज्य में अकेले लड़ रही है।

सदानंद सिंह की जिद्द के आगे झुकी आरजेडी

इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले भी सदानंद सिंह आरजेडी से गठबंधन तोड़कर अकेले दमखम से मैदान में उतरने की बात करते रहे। जब पार्टी नेतृत्व इस बात से तैयार नहीं हुआ तो सदानंद सिंह ही वह नेता थे जो गठबंधन में लगातार 70 सीटों की डिमांड करते रहे। आखिरकार आरजेडी को झुकना पड़ा और कांग्रेस को इतनी ही सीटें मिल गई हैं।

कहलगांव विधानसभा सीट के लोगों के नेता हैं सदानंद सिंह

आरजेडी को लेकर सदानंद सिंह के अब तक के स्टैंड को देखें तो वह हमेशा से इस पार्टी की मुखालफत करते रहे हैं। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व जब भी गठबंधन का फैसला लेती है तो सदानंद सिंह पार्टी के प्रति नैतिकता का ख्याल रखते हुए पूरे मनोयोग से काम में जुट जाते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सदानंद सिंह ने कभी भी अपना चुनाव क्षेत्र भी नहीं बदला। 1969 से 2015 तक लगातार 12 बार कहलगांव सीट से चुनाव लड़े और नौ बार जीते। विधानसभा अध्यक्ष के अलावा बिहार सरकार में कई विभागों के मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 1977 की जनता लहर में भी सिंह ने कहलगांव सीट से जीत दर्ज की थी। 1985 में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया तो वह कहलगांव से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते।

सदानंद सिंह ने बेटे को दी राजनीतिक विरासत

सदानंद सिंह इस बार का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। कहलगांव सीट से कांग्रेस ने इस बार उनके पुत्र शुभानंद मुकेश को टिकट दिया है। शुभानंद ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पिताजी ने चुनावी विश्राम लिया है, लेकिन वह कांग्रेस को लाभ पहुंचाने के लिए राजनीति करते रहेंगे। कांग्रेस के पुराने नेताओं और सदानंद सिंह को नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि वे विचारों की राजनीति में विश्वास करते हैं। सदानंद सिंह बिहार के उन इक्के-दुक्के नेताओं में से हैं जिनपर कभी भी किसी किस्म के दाग नहीं लगे। सूत्र ये भी बताते हैं कि सदानंद सिंह चाहते हैं कि कांग्रेस का अगर जेडीयू से गठबंधन होता तो शायद ज्यादा अच्छा होता। सदानंद सिंह ने इसके लिए पहले भी कई बार प्रयास भी किए हैं। सदानंद सिंह और नीतीश कुमार एक ही बिरादरी कुर्मी समाज से आते हैं। दोनों नेता एक दूसरे का सम्मान भी करते हैं।

सदानंद सिंह का अर्जुन कौन?

यहां बता दें कि मीडिया में अक्सर खबरें तैरती रहती है कि अगर बिहार में कांग्रेस ज्यादा मजबूत होती है तो जेडीयू+कांग्रेस का गठजोड़ देखने को मिल सकता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि कांग्रेस का जनाधार बढ़ेगा। 2015 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी और नीतीश कुमार के साथ गठबंधन के दौरान कांग्रेस को 50 सीटें मिली थीं, जिसमें उन्हें 28 पर जीत मिली थी। देखना होगा कि इस बार के चुनाव में सदानंद सिंह जैसे भीष्म पितामह रूपी नेता के नेतृत्व में कांग्रेस कैसा प्रदर्शन करती है। हालांकि इन बातों के बीच बिहार के नुक्कड़ चौराहों पर होने वाली चर्चाओं में यह बात होती रहेगी कि भीष्म रूपी सदानंद सिंह के अर्जुन कौन हैं।



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