रेप पर बर्खास्त भी हुई है यूपी सरकार

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यह फरवरी 1980 का वाकया है। देश राजनीतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद एक बार फिर से इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की वापसी हो चुकी थी, लेकिन राज्यों में अभी इसकी शुरुआत होनी बाकी थी। यह तय था कि जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी है और कांग्रेस ने वापसी कर ली है तो राज्यों में जनता पार्टी की सरकारों का ज्यादा चलना मुमकिन नहीं है। यूपी में उस वक्त जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास थे। उन्हें मुख्यमंत्री बने एक साल हो रहा था। जून 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद सबसे पहले मुख्यमंत्री राम नरेश यादव हुए थे और फिर जनता पार्टी की टॉप लीडरशिप ने उन्हें फरवरी 1979 में हटाकर बाबू बनारसी दास को मुख्यमंत्री बना दिया था। खैर, हम आते हैं उस कांड की तरफ, जो बाबू बनारसी दास की सरकार की बर्खास्तगी का कारण बना था। यूपी का एक जिला है देवरिया। उसका एक गांव हुआ करता था- नारायणपुर। अब यह गांव कुशीनगर जिले का हिस्सा हो चुका है। इस गांव में एक बूढ़ी औरत रहा करती थीं, और उनके साथ दुर्भाग्य यह जुड़ा था कि उनके बेटे की मौत हो चुकी थी और बहू ने घर छोड़ दिया था। ऐसे में दो छोटे पोते-पोतियों को पालने की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी, लेकिन एक रोज जब वे स्थानीय बाजार से गुजर रही थीं, तो एक बस से उनका एक्सीडेंट हो गया, जिससे उनकी मौके पर मौत हो गई। इस घटना से नाराज ग्रामीणों ने सड़क जाम करके पथराव शुरू कर दिया। इसके बाद तो नारायणपुर में धीरे-धीरे हिंसा और आगजनी दौर शुरू हो गया। हालात इतने बिगड़े कि काबू पाने को पीएसी बुलानी पड़ी और गांव में बाकायदा उनका एक कैंप लगा दिया गया।

मंत्री का शर्मसार होना
नारायणपुर गांव में जब पीएसी तैनात की गई तो सुबह गांव में यह कानाफूसी शुरू हो गई कि रात में पीएसी के जवानों ने गांव में औरतों के साथ दुराचार किया है। गांव से यह खबर निकल कर जिला मुख्यालय तक पहुंची, फिर राजधानी तक और उसके बाद ‘नारायणपुर रेप कांड’ राष्ट्रीय मुद्दे की शक्ल में बदल गया। यहीं से बाबू बनारसी दास सरकार की मुश्किलों का वह दौर शुरू हुआ, जिसकी कांग्रेस को बेसब्री से तलाश थी। बाबू बनारसी दास की मुश्किल तब और भी बढ़ गई, जब उन्हीं की सरकार में मंत्री मोहन सिंह नारायणपुर गांव पहुंचे और स्थानीय लोगों से मुलाकात के बाद उन्होंने बयान दिया, ‘मुझे शर्म आ रही है कि मैं ऐसी सरकार में मंत्री हूं, जिसकी पुलिस ने नारायणपुर में दुष्कर्म जैसी घटना की।’ इसके बाद तो उनकी सरकार की बर्खास्तगी की मांग शुरू हो गई। खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नारायणपुर पहुंचने का ऐलान कर दिया। एक प्रधानमंत्री का किसी बलात्कार की घटना में किसी गांव में पहुंचना एक बहुत बड़ी बात तो मानी ही जाती है। इंदिरा गांधी का नारायणपुर जाने का कार्यक्रम आने के बाद ही राजनीतिक गलियारों में यह माना जाने लगा था कि कुछ बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम होने वाला है। बाबू बनारसी दास ने स्थितियों को सामान्य बनाने की भरसक कोशिश की। सरकार के अंदर असंतुष्ट खेमे को सहेजा। स्थानीय लोगों से बयान भी दिलवाए कि राज्य सरकार ने अब तक जो कार्रवाई की है, उससे वे संतुष्ट हैं, लेकिन कोई भी कोशिश उनके लिए राहत का सबब नहीं बन पाई। इंदिरा गांधी ने कार्यक्रम के मुताबिक अपना दौरा किया और 17 फरवरी 1980 को बाबू बनारसी दास की सरकार बर्खास्त हो गई। एक तरह से राज्य में यह जनता पार्टी के युग का समापन था।

113 दिन का राष्ट्रपति शासन
बनारसी दास की सरकार बर्खास्त होने के बाद यूपी में 113 दिन राष्ट्रपति शासन लगा रहा। इस वक्फे में कांग्रेस ने राज्य में वापसी की तैयारियां कीं तो इसी बीच नए चुनाव की घोषणा भी हुई। उस वक्त कांग्रेस के लिए सबसे सुकून की बात यह रही कि तब जनता पार्टी चार धड़ों में बंट चुकी थी। जनता पार्टी, जनता पार्टी जयप्रकाश, जनता पार्टी सेकुलर चरण सिंह और जनता पार्टी सेकुलर राजनारायण। मगर ये चारों पार्टियां कांग्रेस के बजाय आपस में ज्यादा लड़ रही थीं। इन चारों में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली जनता पार्टी को ही उस चुनाव में सबसे ज्यादा 59 सीटें मिलीं थीं, लेकिन विशाल बहुमत तो कांग्रेस के ही हिस्से में गया। उस वक्त राज्य की विधानसभा में 425 सीटें हुआ करती थीं और कांग्रेस को 309 सीटों पर जीत मिली थी। केंद्र के बाद देश के सबसे बड़े राज्य में भी कांग्रेस की वापसी हो गई थी। कांग्रेसियों की मंशा थी कि संजय गांधी मुख्यमंत्री बनें। 1977 में कांग्रेस के पतन के लिए वही जिम्मेदार माने गए थे और 1980 में कांग्रेस की वापसी में उनके आक्रामक तेवरों को ही श्रेय दिया जा रहा था। खासतौर पर यूपी में उनके नेतृत्व में कांग्रेस सड़कों पर संघर्ष करती दिखी थी। यह वह दौर था, जब उनके नेतृत्व में युवा नेताओं की नई पौध तैयार हुई थी। लेकिन इंदिरा गांधी ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, और वीपी सिंह को मुख्यमंत्री चुना। उस वक्त वीपी सिंह की गिनती इंदिरा गांधी के विश्वसनीय लोगों में हुआ करती थी, संजय गांधी का भी उन्हें विश्वास हासिल था। वीपी सिंह का मुख्यमंत्री चुना जाना कांग्रेस की ओर से राज्य के जातीय समीकरणों में बदलाव की तरफ बढ़ाया जाने वाला कदम माना गया था। ज्यादातर मौकों पर ब्राह्मण मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस ने ठाकुर चेहरे पर दांव लगाया था, जबकि एक समय कांग्रेस का जिताऊ समीकरण ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित माना जाता था।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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