लोकतंत्र के दोराहे पर खड़ा वोटर बिहार का

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लेखकः लाल बहादुर सिंह
महामारी के दौर में होने जा रहे बिहार चुनाव की ओर स्वाभाविक ही पूरे देश की निगाह लगी हुई है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल विधानसभा के महत्वपूर्ण चुनावों के ठीक पहले हो रहे इन चुनावों के नतीजों का राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ना तय है। देश गहरे संकट से गुजर रहा है। समाज में हलचल है। जनता के तमाम तबके आंदोलित हैं और सड़क पर उतर रहे हैं। आंदोलनों के दबाव में एनडीए दरक रहा है। ऐसे में बिहार चुनाव के नतीजे नई आंदोलनात्मक संभावनाओं को जन्म दे सकते हैं। रही बात चुनाव नतीजों के आकलन की तो अभी हाल तक इसे एकतरफा माना जा रहा था। नीतीश कुमार की पुनर्वापसी तय बताई जा रही थी। वजह? एक तो मोदी जी की लोकप्रियता। ऐसी धारणा बना दी गई है कि भारत में सब कुछ परिवर्तनशील है, बस मोदी जी की लोकप्रियता को छोड़कर। दूसरा तर्क यह कि जो सामाजिक-राजनीतिक समीकरण उन्हें सत्ता में लाया था, वह बदस्तूर कायम है।

बदलते समीकरण
आश्चर्यजनक है कि यह सब उस महा आपदा के साये में होने जा रहे चुनाव के बारे में कहा जा रहा था, जिसने डबल इंजन की सरकार के डबल डिजास्टर को अभी हाल ही में दुनिया के सामने पूरी तरह बेपर्दा कर दिया है। जिसने वतन लौट रहे प्रवासी बिहारी मजदूरों को खून के आंसू रुलाए हैं और अभी भी जनता का बड़ा हिस्सा आर्थिक तबाही-बाढ़-महामारी जैसे संकटों के पहाड़ से चौतरफा घिरा हुआ है। बहरहाल, चुनाव की घोषणा होने के बाद हर नए दिन के साथ यह गढ़ी गई धारणा ध्वस्त होती जा रही है। अब यह आमराय बनती जा रही है कि राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और यह संभव है कि कल तक अपराजेय माने जा रहे नीतीश कुमार इस चुनाव के सबसे बड़े लूजर साबित हों।

मुकाबला आम तौर पर दोनों मुख्य गठबंधनों के बीच आमने-सामने का होगा। इसमें एलजेपी जिन जगहों पर तीसरा कोण बनाएगी, वहां ऊंट किस करवट बैठेगा यह देखना रोचक होगा। कुछ छोटे जाति आधारित दल भी मैदान में हैं, पर वे वोटकटवा वाली भूमिका ही निभाएंगे। बीजेपी की दो नावों की सवारी जरूर उसे भारी पड़ सकती है। समाज में यह संदेश चला गया है कि चिराग पासवान अमित शाह के शातिर खेल के मोहरे हैं। ऐसे में बीजेपी और नीतीश के सामाजिक आधार के बीच अविश्वास गहरा सकता है और अगर यह प्रतिक्रिया वोटों में व्यक्त हुई तो न सिर्फ उन सीटों पर जहां महागठबंधन के खिलाफ एलजेपी और नीतीश आमने सामने हैं, बल्कि वहां भी जहां महागठबंधन के मुकाबले बीजेपी है, महागठबंधन के पक्ष में आश्चर्यजनक नतीजे आ सकते हैं।

वैसे तो संघ-बीजेपी की विकास यात्रा में अनेक कारकों और परिस्थितियों का योगदान है, पर कांग्रेस के एकाधिकार को तोड़ने के लिए गैर-वामपंथी विपक्ष की धारा ने 60, 70, 80 के दशक में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर उनसे जो बार-बार हाथ मिलाया, उसके फलस्वरूप गांधी जी की हत्या के बाद अलग-थलग पड़ चुकी संघ की धारा ने सामाजिक-राजनैतिक वैधता तथा शक्ति अर्जित की। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आक्रामक हिंदुत्व के रथ पर सवार संघ-बीजेपी को एक बार फिर झटका लगा, जब वह राजनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ गई। उसके अभियान के मुख्य केंद्र हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ता उसके हाथ से चली गई और बिहार में वह सत्ता से कोसों दूर थी। उत्तर प्रदेश में तो 2002 आते आते वह खिसक कर तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी। वहां उसकी सीटें 1991 के 221 से घटते घटते 2012 में 47 पर पहुंच गई।

उस दौर में जॉर्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी को इस राजनीतिक अलगाव से निकलने में सबसे बड़ी मदद की। 2013-14 के बाद एक छोटी सी अवधि को छोड़ दें तो 1996 से आज तक यानी लगभग चौथाई सदी से वे बीजेपी के सबसे मजबूत संश्रयकारी बने हुए हैं। लेकिन अभी लगता है कि संघ-बीजेपी के उत्थान में नीतीश अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुके हैं और अब बीजेपी उन्हें दरकिनार कर बिहार में स्वयं केंद्रीय भूमिका में आने के लिए बेचैन है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि बिहार का एक भवितव्य यह हो सकता है कि वह बरास्ते उत्तर प्रदेश लोकतंत्र की नई कब्रगाह बन जाए। दूसरी संभावना यह है कि बिहार लोकतांत्रिक सुधार और आर्थिक पुनर्जीवन के एक नए रास्ते पर बढ़े।

इसमें वामपंथी ताकतों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, सदन के अंदर और बाहर। मौजूदा दौर में बिहार की राजनीति में सीपीआई-एमएल की उपस्थिति एक अहम कारक है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीपीआई-एमएल की उपस्थिति ने चुनाव को सिद्धांतहीन, मुद्दाविहीन नहीं बनने दिया। गरीब-गुरबों के लिए अपने संघर्षों और राजनीति की शानदार विरासत के साथ नीतीश-बीजेपी राज के खिलाफ वह लगातार आंदोलन का झंडा बुलंद किए रही। नागरिकता कानून के प्रश्न पर संविधान के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे की हिफाजत के लिए पूरे जोशो-खरोश के साथ राज्यव्यापी अभियान चलाया, जिसने नीतीश कुमार को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया और बिहार में एनआरसी न लागू करने का प्रस्ताव विधानसभा में पास करना पड़ा।

ताजा हवा का झोंका
धनबल-बाहुबल, जाति-समुदाय के समीकरण के बल पर खड़े मुख्यधारा दलों के दबंग-माफिया प्रत्याशियों के विपरीत सीपीआई-एमएल के प्रत्याशी प्रदूषित वातावरण में ताजा हवा के झोंके की तरह हैं। समाज के हाशिये के तबकों से आने वाले बेदाग छवि के इन प्रत्याशियों की संघर्षशील पहचान है। जाहिर है, वामपंथ की भागीदारी महागठबंधन को जनता के बीच अधिक स्वीकार्य बना सकती है। वामपंथी तथा बहुरंगी लोकतांत्रिक ताकतें रैडिकल लोकतांत्रिक सुधार, आर्थिक पुनर्जीवन और सांस्कृतिक जागरण के वैकल्पिक कार्यक्रम के साथ चुनाव में सशक्त हस्तक्षेप करते हुए नए लोकतांत्रिक बिहार के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं और इस क्रम में पूरे देश को एक नई राह दिखा सकती हैं।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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