विपक्ष में भी सिकुड़ती जा रही है कांग्रेस

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पिछले दिनों ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी का एक बयान आया है। कह रहे हैं कि कांग्रेस का साथ लेना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी गलती रही। कांग्रेस का साथ लेकर उन्होंने बहुत कुछ गंवा दिया। कांग्रेस ने तुरंत रिएक्ट किया। पार्टी के सीनियर लीडर और कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके सिद्धारमैया बोले, ‘कुमारस्वामी झूठ बोलने में माहिर हैं। वे राजनीति की खातिर हालात के मुताबिक झूठ बोल सकते हैं। जनता दल (एस) को 37 सीटें मिलने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री बनाना क्या हमारी गलती थी?’ चलिए सिद्धारमैया की बात पर यकीन कर लेते हैं कि कुमारस्वामी झूठ बोलने में माहिर हैं और वे झूठ बोल रहे हैं। लेकिन 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव के इस बयान को याद कीजिए, ‘कांग्रेस के साथ गठबंधन ने हमारा बहुत नुकसान किया। हम आगे से उसके साथ कोई गठबंधन नहीं करेंगे।’ और अभी पिछले महीने की ही तो बात है, बिहार विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आने के बाद आरजेडी के सीनियर लीडर शिवानंद तिवारी ने महागठबंधन की हार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। कहा था, ‘कांग्रेस गठबंधन में ज्यादा से ज्यादा सीट तो मांग लेती है, लेकिन उसमें जीतने का दम ही नहीं।’ अगर इन तीनों बयानों को जोड़ें तो साफ दिख रहा है कि हार दर हार और आंतरिक खेमेबाजी से भी बड़ा संकट कांग्रेस के लिए अब शुरू होने वाला है। वह संकट यह है कि उसे विपक्ष में भी सहयोगी मिलना मुश्किल हो सकता है। एक वक्त था जब कांग्रेस ‘समान विचारधारा’ वाले दलों से भी कोई रिश्ता कायम नहीं रखना चाहती थी, लेकिन हालात ने उसे ऐसा मजबूर किया कि क्षेत्रीय दलों के साथ जूनियर भूमिका में रहने को भी राजी होती गई। पर अब क्षेत्रीय दल उसे अपने साथ भी रखना चाहेंगे या नहीं, कहना मुश्किल हो गया है।

क्षेत्रीय दलों की बेरुखी की वजह
क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस को अपने साथ रखने में नफा कम, नुकसान ज्यादा लगने लगा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब यूपी में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब इसे हिंदी बेल्ट की राजनीति में एक बड़े बदलाव की तरफ इशारा माना गया था। यहां तक कहा जाने लगा था कि अगर यह प्रयोग सफल हो गया, तो आगे की राजनीति में कहीं ज्यादा बड़े बदलाव देखे जा सकेंगे। उस वक्त विधानसभा में सवा दो सौ विधायक रखने वाली समाजवादी पार्टी ने भी इसी उम्मीद पर अपने कई मौजूदा विधायकों और 2012 के चुनाव में नजदीकी मुकाबले में हार जाने वाले उम्मीदवारों के टिकट काट कर कांग्रेस को 114 सीट दे दी थी। अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव अव्वल तो इस गठबंधन के ही खिलाफ थे। गठबंधन हो जाने पर उनका कहना था कि ‘कांग्रेस की हैसियत यूपी में 20 सीट से ज्यादा पर चुनाव लड़ने की है ही नहीं।’ हुआ भी वही। दबाव के जरिए समाजवादी पार्टी से 114 सीट छुड़वा लेने वाली कांग्रेस इन सीटों में से महज सात सीट ही जीत पाई थी। तब समाजवादी पार्टी के नेताओं ने कहा था कि अगर वे लोग इन सीटों पर अकेले चुनाव लड़ते, तो कम से कम 20 सीट तो जीत ही सकते थे। बिहार के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2015 के चुनाव में कांग्रेस 41 सीट पर चुनाव लड़ी थी। इस बार वह 100 सीट की मांग पर अड़ गई और किसी तरह 70 सीटों पर मानी, लेकिन उसमें से सिर्फ 19 ही जीत पाई। तभी शिवानंद तिवारी का बयान आया कि ‘कांग्रेस महागठबंधन के पैर में जंजीर बन गई। 70 उम्मीदवार चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस 70 सभा तक आयोजित नहीं कर पाई।’ समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरह शिवानंद तिवारी भी मानते हैं कि अगर कांग्रेस ने ज्यादा सीटों पर लड़ने की जिद छोड़ दी होती, तो नतीजा कुछ और होता। 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कांग्रेस ने एनसीपी पर दबाव बनाकर गठबंधन में ज्यादा सीटें तो छुड़वा लीं, लेकिन उसकी जीत का स्ट्राइक रेट एनसीपी से कम रहा। 147 सीटों पर कांग्रेस महज 44 सीट ही जीती, जबकि एनसीपी 121 में से 54 जीत गई।

अकेले चले तो कैसे और गठबंधन करे तो कैसे
पांच महीनों के अंदर जिन चार प्रमुख राज्यों- वेस्ट बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल में चुनाव होने हैं, कांग्रेस उनमें कहीं भी अकेले मुकाबले में नहीं है। उसे क्षेत्रीय दलों का सहयोग लेना ही होगा। लेकिन जो तस्वीर उभरी है, उसमें क्षेत्रीय दल कांग्रेस का कितना साथ लेना चाहेंगे और अगर साथ ले भी लेते हैं तो उसे कितनी अहमियत देना चाहेंगे, यही सवाल कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब है। वेस्ट बंगाल में पहली कोशिश यह चल रही है कि बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बने और उसमें टीएमसी और वामदल भी शामिल हों। अगर ऐसा नहीं होता है तो कांग्रेस वामदलों के साथ चुनाव मैदान में जाना चाहती है। लेकिन वामदल कांग्रेस को एक सीमा से अधिक तवज्जो देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। असम में भी कांग्रेस इस बार एआईयूडीएफ के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाह रही है। पिछले चुनाव में एआईयूडीएफ की इच्छा कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने की थी, लेकिन तब कांग्रेस ने उसे गठबंधन में शामिल नहीं किया था। इस बार कांग्रेस उसे अपने साथ लेना चाहती है, लेकिन एआईयूडीएफ चीफ मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने दो टूक कह दिया है, ‘किसी भी दल के साथ कोई भी गठबंधन होगा, तो उसमें सामने वाले दल की हैसियत के अनुसार ही उसकी हिस्सेदारी तय होगी। वरना हम तो अकेले चुनाव लड़ने वाले लोग हैं और अकेले लड़कर भी हम जीतते हैं।’ कांग्रेस के लिए तमिलनाडु में डीएमके से अपने लिए सीटें छुड़वाना और भी ज्यादा मुश्किल होगा। तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना कोई वजूद ही नहीं है। एक समय तमिलनाडु के क्षेत्रीय दल कांग्रेस को अपने साथ इसलिए रख लिया करते थे कि इससे उनके लिए राष्ट्रीय राजनीति में दरवाजे खुल जाते थे। केरल में भी कांग्रेस के लिए सहयोगी दलों पर दबाव बनाना आसान नहीं होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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