शहर में लाचार हैं गांवों से वापस आ रहे मजदूर

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लेखकः अंजनी कुमार
देश में लॉकडाउन की घोषणा के बाद आने वाली चुनौतियों को भांपकर गांव लौटने वाले मजदूर काम की तलाश में फिर से शहरों में आने लगे हैं। यह खबर अर्थव्यवस्था की चिंता करने वालों को सुकून दे सकती है, पर उन चुनौतियां उन मजदूरों का पीछा नहीं छोड़ रही हैं। जिस तरह से वे खाली हाथ गए थे, वैसे ही खाली हाथ लौट रहे हैं। तब उनके पास गांव लौटने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। आज जब वे वापस आ रहे हैं तो शहर में टिकने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं है और उन्हें रोजगार मिल नहीं पा रहा।

महामारी की मार से बचने के लिए जब मजदूर गांव जाने के लिए निकले तो उन्हें हफ्तों पैदल चलना पड़ा। तब अनुमान लगाने का दौर चला कि भारत में कितने प्रवासी मजदूर हैं? यह अनुमान 4.50 करोड़ से लेकर 11 करोड़ तक का था। इन मजदूरों में से कुछ खेती से बचे समय में काम के लिए शहर भागते हैं और ज्यादातर सालभर काम करते हैं। उनका लक्ष्य रहता है घरेलू काम के लिए जो कर्ज लिया गया था, उसका भुगतान हो सके, शादी-ब्याह में मदद मिल सके, टूटा हुआ घर बन जाए। ऐसे में ये मजदूर अपनी बचत दूसरों को भुगतान करने, खेती, घरेलू खर्चों को पूरा करने में लगा देते हैं। इन मजदूरों का रोजगार तो अनियमित होता ही है, वेतनमान भी हमेशा तय नहीं होता और भुगतान में भी मनमानी चलती है। देश में इन मजदूरों की कुल संख्या 45 से 50 करोड़ के बीच मानी जाती है। संगठित क्षेत्र कुशल मजदूरों के लिए है पर वहां भी छंटनी, बंदी का सिलसिला चलता रहता है।

गांवों से शहर आ रहे मजदूरों की भी कोई सुधि ले

लॉकडाउन के दौरान शहरों में फंसे इन मजदूरों के लिए वे दिन सजा हो गए थे। सरकारें इनके अत्यंत छोटे से हिस्से को जीने की जरूरत भर का भोजन खिला रही थी। सीमित समय के लिए सराय बने। बाकी भी जो इंतजाम किए गए और जिनका ढिंढोरा पीटा गया, वे मजदूरों के जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भी काफी नहीं थे। इसका नतीजा पूरे देश के स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में मजदूर की हैसियत गिर जाने के रूप में हुआ।

लॉकडाउन के दौरान जीवन स्तर गिरने का परिणाम मजदूरों के वेतन, संगठन, हड़ताल और काम से जुड़े पुराने कानूनों की जगह नये कानूनों-अध्यादेशों को लाने के रूप में भी दिख रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों ने हड़ताल को प्रतिबंधित कर दिया है। काम के घंटों में मनमानी करने की छूट दी गई है। ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि मजदूर के रोजमर्रा के जीवन का मूल्य सरकारों ने इस कदर गिरा दिया कि उनके श्रम का बाजार मूल्य भी गिर गया। लॉकडाउन ने श्रम को मूल्य के रसातल में पहुंचा दिया। आज जब संसद के वर्तमान सत्र में सरकार मृत मजदूरों का डेटा तक बताने की स्थिति में नहीं है और इसी आधार पर मारे गए मजदूरों के परिजनों को मुआवजा देने से इनकार कर रही है, तो इसे मजदूरों के प्रति उसकी उदासीनता भर कह देना काफी नहीं है। इसे मजदूरों के जीवन-मूल्य से जुड़े श्रम-मूल्य के प्रति अपनाए गए दृष्टिकोण के रूप में भी परखने की जरूरत है। भारत के पूंजीपति वर्ग का एक छोटा सा हिस्सा इस गिरावट से चिंतित है। राजीव बजाज जैसे उद्योगपतियों ने इसका खुलकर विरोध भी किया है, पर जानना जरूरी है कि वे कौन हैं जिन्हें इससे फायदा होगा।

आज जब मजदूर शहरों की ओर वापस आ रहे हैं तो सरकार उन पर न्यूनतम खर्च भी नहीं कर रही है। अब काम के अभाव में मजदूर की आय में कमी तो होगी ही, काम के हालात भी और बदतर होने वाले हैं। करोड़ों की आबादी फिर गांव से शहर आ रही है, आपदा का प्रभाव भी दोहरा होगा। मजदूरों की अनदेखी अर्थव्यवस्था और समाज के लिए खतरनाक साबित होगी। इसका असर दूरगामी और गहरा होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि लौटते मजदूरों को लेकर जितनी जल्दी संभव हो, एक उचित नीति अपनाई जाएगी।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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