श्रम सुधारों से बढ़ेगी इकॉनमी की रफ्तार

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लेखकः जयंतीलाल भंडारी
हाल ही में संसद ने तीन प्रमुख श्रम सुधार विधेयक- इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडिशंस कोड 2020 और कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020 पारित किए, जो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बन गए। कोविड-19 की चुनौतियों और भारत के लिए वैश्विक उद्योग-कारोबार के बढ़ते मौकों को ध्यान में रखते हुए नए श्रम कानून नियोक्ता, कर्मचारी तथा सरकार, तीनों के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकते हैं। इंडस्ट्रियल रिलेशन कानून के तहत सरकार भर्ती और छंटनी को लेकर कंपनियों को ज्यादा अधिकार देगी। अभी तक 100 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी या यूनिट बंद करने से पहले सरकार की मंजूरी नहीं लेनी पड़ती थी। अब यह सीमा बढ़ाकर 300 कर्मचारी कर दी गई है। इससे औद्योगिक मुश्किलों के दौर में बड़ी कंपनियों के लिए कर्मचारियों की छंटनी करना और कारखाना/ऑफिस बंद करना आसान होगा।

श्रमिकों को सहूलियतें
नए श्रम कानूनों से देश के संगठित और असंगठित, दोनों ही श्रेणी के श्रमिकों को कई प्रकार की नई सुविधाएं मिलेंगी। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड का निर्माण किया जाएगा। देश के सभी जिलों और खतरनाक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को अनिवार्य रूप से कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की सुविधा से लाभान्वित किया जाएगा। सेल्फ असेसमेंट के आधार पर असंगठित क्षेत्र के श्रमिक अपना इलेक्ट्रॉनिक पंजीयन करा सकेंगे। घर से काम पर आने-जाने के दौरान दुर्घटना होने पर कर्मचारी हर्जाना पाने का हकदार होगा। महिला श्रमिक अपनी इच्छा से रात की पाली में भी काम कर सकेंगी। फिक्स्ड टर्म स्टाफ को भी स्थायी श्रमिकों की तरह सारी सुविधाएं मिलेंगी। यहां तक कि एक साल के कांट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी को भी ग्रैच्युटी जैसी सुविधा मिलेगी। अभी कम से कम पांच साल काम करने पर ही ग्रैच्युटी का लाभ मिलता है।

इतना ही नहीं, सभी श्रमिकों को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य होगा। उनके वेतन का डिजिटल भुगतान करना होगा। साल में एक बार सभी श्रमिकों का हेल्थ चेकअप भी अनिवार्य बना दिया गया है। प्रवासी मजदूरों का डाटा रखने के लिए लेबर ब्यूरो बनाया जाएगा जिसके पास सभी प्रवासी श्रमिकों की विस्तृत जानकारी होगी। सभी राज्यों व विभागों से प्रवासी मजदूरों का डाटा लिया जाएगा। नए कानून के तहत सभी प्रवासी श्रमिकों को साल में एक बार अपने मूल निवास पर जाने के लिए सरकार की तरफ से सुविधा मुहैया कराई जाएगी।

श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ बेंगलुरु में आयोजित एक रैली

उद्यमियों के लिए उनका कारोबार आसान बनाने के उद्देश्य से भी इसमें कई प्रावधान लाए गए हैं। उन्हें यूनिट चलाने के लिए अब सिर्फ एक पंजीयन कराना होगा। अभी तक उन्हें छह प्रकार का पंजीयन कराना होता था। उद्यमियों को सभी प्रकार की श्रम संबंधी संहिता के पालन को लेकर सिर्फ एक रिटर्न दाखिल करना होगा। अभी तक आठ रिटर्न दाखिल करने पड़ते थे। श्रम इंस्पेक्टर बिना बताए यूनिट के निरीक्षण के लिए नहीं जाएंगे। फेसलेस तरीके से यूनिट का रैंडम निरीक्षण किया जाएगा। श्रम संहिताओं के तहत नियमों का अनुपालन नहीं करने को लेकर अधिकतम सजा सात साल से घटाकर तीन साल की गई है। इसके अलावा अदालतों द्वारा नियोक्ताओं पर लगाए जाने वाले जुर्माने का 50 प्रतिशत लाभ कर्मचारियों को मिलेगा। यह अदालत द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली क्षतिपूर्ति के अलावा होगा।

उल्लेखनीय है कि कोविड-19 की चुनौतियों के बीच विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा भी श्रम सुधारों के तहत कई ऐसे कदम उठाए गए हैं जिनमें अधिक उत्पादन और नई स्थापित होने वाली इकाइयों को श्रम कानूनों के अनुपालन में काफी छूट दी गई है। खास तौर से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, असम, महाराष्ट्र, ओडिशा और गोवा आदि राज्यों ने श्रम सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा कारखाने का लाइसेंस लेने की शर्तों में भी ढील दी गई है। कारखाना अधिनियम 1948 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अधिकांश प्रावधान लागू किए जाने में भी बड़ी रियायतें दी गई हैं। उत्पादन बढ़ाने के लिए कई राज्यों ने उत्पादन इकाइयों में काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 कर दिया है।

दुनिया के आर्थिक और श्रम संगठन बार-बार कहते रहे हैं कि श्रम सुधारों से ही भारत में उद्योग-कारोबार का तेजी से विकास हो सकेगा। यदि हम श्रम को शामिल कर विभिन्न मापदंडों पर बनाई गई वैश्विक रैंकिंग को देखें तो पाते हैं कि भारत उनमें अभी बहुत पीछे है। विश्व बैंक की कारोबार सुगमता रैंकिंग ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ 2020 में भारत 63वें स्थान पर रहा है। वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के ग्लोबल सोशल मोबिलिटी इंडेक्स 2020 के तहत वैश्विक सामाजिक सुरक्षा की रैकिंग में भारत 82 देशों की सूची में 76वें क्रम पर है। ग्लोबल इकनॉमिक फ्रीडम इंडेक्स 2020 में भारत 105वें स्थान पर है। इसी तरह विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा सूचकांक 2019 में 140 देशों की अर्थव्यवस्थाओं में भारत 58वें स्थान पर है।

समन्वय पर जोर
निस्संदेह नए श्रम कानूनों से भारत की श्रम संबंधी वैश्विक रैंकिंग में सुधार होगा और भारत को इसके बहुआयामी फायदे मिलेंगे। श्रम कानूनों में नए बदलाव का मतलब श्रमिकों का संरक्षण समाप्त करना ही नहीं, उद्योग-कारोबार के बढ़ने की संभावना को गतिशील करके उद्योगों में नए श्रम अवसर निर्मित करना भी है। उद्योग जगत को भी समझना होगा कि नए श्रम कानूनों के मद्देनजर श्रमिकों को खुश रखकर ही उद्योगों को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकेगा। सरकार को अधिकतम प्रयास करना होगा कि श्रम और पूंजी के हितों में समन्वय बना रहे। आशा करें कि देश तेजी से आर्थिक व औद्योगिक विकास के लिए नए श्रम कानूनों के तहत चार चमकीली श्रम संहिताओं से उत्पादन वृद्धि, निर्यात वृद्धि, रोजगार वृद्धि और ऊंची विकास दर के लक्ष्यों को प्राप्त करने की डगर पर आगे बढ़ेगा और इससे भारत वैश्विक उद्योग-कारोबार के क्षितिज पर भी अपनी नई पहचान बनाने में कामयाब होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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