संयोग या साजिश- बिहार चुनाव के ठीक पहले 2015 में दादरी की घटना और 2020 में हाथरस मामला ?

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हाइलाइट्स:

  • बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के ठीक पहले 28 सितंबर को हुए दादरी कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था
  • 2020 बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले गर्म है दलित युवती के साथ गैंग रेप का मामला
  • बिहार चुनाव 2015 के ठीक पहले UP में अखलाख की मौत के बाद चला था अवार्ड वापसी का दौर
  • 2020 बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जातीय और सांप्रदायिक दंगों के लिए अंतरराष्‍ट्रीय फ़ंडिंग की आ रही बू

नीलकमल, पटना
यह महज संयोग है या फिर कोई बड़ी साजिश क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के ठीक पहले 28 सितंबर को हुए दादरी कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। तब मोहम्मद अखलाक के घर पर मिला मांस का टुकड़ा बीफ था या मटन, इस मामले में पुलिस ने शुरुआती जांच में इसे मटन बताया था लेकिन, फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट में इसे गौमांस बताया गया था। अब बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के ठीक पहले 14 सितंबर को उत्तर प्रदेश के ही हाथरस में 19 वर्षीय एक दलित युवती के साथ 4 लोगों द्वारा तथाकथित गैंगरेप करने का मामला सामने आ गया।

क्या है पूरा हाथरस का पूरा मामला
हाथरस में 14 सितंबर को 4 लोगों ने 19 साल की दलित युवती से कथित गैंगरेप किया था। बताया गया कि आरोपियों ने युवती की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी और उसकी जीभ भी काट दी थी। उसके बाद इलाज के दौरान 29 सितंबर को पीड़ित की मौत हो गई। मामले में चारों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए हैं। हालांकि, पुलिस का दावा है कि दुष्कर्म नहीं हुआ था। दरअसल यह घटना हाथरस जिले के चंदपा इलाके के बुलगढ़ी गांव में घटी थी। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार इस मामले की जांच SIT से करवाने के साथ CBI जांच की सिफारिश भी की है। इसके अलावा पीड़ित का शव जल्दबाजी में जलाने और लापरवाही के आरोपों के बीच हाथरस के एसपी समेत कई पुलिसकर्मी सस्पेंड किए गए हैं।

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क्या हाथरस कांड के बहाने की जा रही जातिय हिंसा भड़काने की कोशिश ?
क्या बिहार चुनाव को देखते हुए उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड को जातिय रंग देने की कोशिश की जा रही है। क्या इस घटना को तूल देकर योगी सरकार और बीजेपी को दलित विरोधी बताने की कोशिश की जा रही है। दरअसल करीब बीस साल की दलित अपनी मां के साथ जानवरों के लिए चारा लाने के लिए खेतों में गई थी। वहां दूसरी जाति के चार युवकों ने मां के सामने ही युवती को खींच लिया। फिर यह बताया गया कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद पूरी नृशंसता से उसकी गर्दन तोड़ी और जीभ काटकर उसे मरा समझकर छोड़कर चारो युवक फरार हो गए। 14 सितंबर को घटी घटना को लेकर राजनीतिक माहौल तब गरम हुआ जब 29 सितंबर को पीड़िता की मौत दिल्ली के अस्पताल में हो गई। इसके बाद कांग्रेसी नेता समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने इस घटना को हाथों हाथ लिया और प्रदेश की योगी सरकार के साथ केंद्र की मोदी सरकार को दलित विरोधी करार देते हुए प्रदर्शन पर उतर आए। कांग्रेसी नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का हाथरस जाकर पीड़ित परिवार से मिलना, क्या इस घटना को जातिय रंग देने की कोशिश थी।

बिहार चुनाव 2015 के ठीक पहले UP में अखलाक की मौत के बाद चला था अवार्ड वापसी का दौर
साल 2015 में लेखकों, शायरों और वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा जो अवार्ड वापस किए गए थे, क्या वो पूरी तरह राजनीति साजिश का हिस्सा था। क्योंकि 2015 में बिहार चुनाव के ठीक पहले सितंबर के महीने में दादरी क्षेत्र के बिहसहड़ा गांव में कुछ लोगों ने गोमांस खाने का आरोप लगाते हुए अखलाक की पिटाई की थी जिससे उसकी मौत हो गई थी। इस घटना के बाद 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले 30 से अधिक बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों ने यूपीए सरकार के समय मिले अपने अवार्डों को वापस कर दिया। अवार्ड वापसी करने वालों का कहना था कि केंद्र की मोदी सरकार और यूपी के योगी सरकार में अल्पसंख्यक मुस्लिमों पर अत्याचार बढ़ गए हैं और देश में कानून की व्यवस्था पहले से बदतर ही गयी है। बता दें कि 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाया गया था। इस सलाहकार परिषद में देश के अनेकों अर्थशास्त्री, सामाजिक वैज्ञानिकों एवं अन्य बुद्धिजीवियों को सदस्य बनाया गया था, और उन्हे मोटी रकम दी जाती थी। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद इस परिषद को खत्म कर दिया गया। बताया जाता है कि 2015 में अवार्ड वापस करने वाले ज्यादातर वही लोग थे जो मनमोहन सिंह द्वारा गए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में शामिल थे। उस वक्त देश के माहौल को खराब करने की पूरी कोशिश की गई थी।

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क्या बिहार चुनाव को देखते हुए 2020 में हाथरस की घटना के पीछे रची जा रही अंतरराष्ट्रीय साज़िश ?
दरअसल हाथरस मामले में संभावित अंतरराष्ट्रीय साज़िश को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस अब तक 20 से अधिक एफआईआर दर्ज कर चुकी है। यूपी पुलिस की ओर से दर्ज FIR में सैंकड़ो लोगों के ख़िलाफ़ राजद्रोह, षडयंत्र, सूबे में शांति भंग करने का प्रयास और धार्मिक नफ़रत को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाए गए हैं। इस मामले में पुलिस को शक़ है कि पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) को हाथरस की घटना को हवा देने के लिए विदेश से फंडिंग की जा रही है। बता दें कि योगी सरकार इससे पहले भी नागरिकता संशोधन क़ानून(CAA) के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों और हिंसा के लिए भी PFI को ज़िम्मेदार ठहराया था। चुकिं बिहार विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लिहाजा हाथरस मामले को तूल देकर बिहार और बिहार का चुनावी माहौल बिगाड़ने की तो कोशिश नही की जा रही। क्योंकि इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कह चुकें हैं कि, ‘हमारे विरोधी अंतरराष्‍ट्रीय फ़ंडिंग के ज़रिए जातीय और सांप्रदायिक दंगों की नींव रखकर हमारे ख़िलाफ़ साज़िश कर रहे हैं’।



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