सभी मिलकर चलें तो जल्द काबू होगा कोरोना

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लेखकः बिल गेट्स/मेलिंडा गेट्स
इस अनिश्चित समय में हम दो बातें निश्चित तौर पर जानते हैं। एक, हमें कोविड-19 महामारी को जल्द से जल्द खत्म करना है और दो, अधिक से अधिक जिंदगियां बचानी हैं। यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों में वैक्सीन बनाने की होड़ लगी हुई है। कुछ देश तो वैक्सीन की रिसर्च और डिवेलपमेंट खत्म होने से पहले ही डोज खरीदने लगे हैं। हमारे फाउंडेशन ने नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी स्थित मॉब्स लैब के मॉडलर्स से दो अलग-अलग परिस्थितियों पर विचार कर एक मॉडल तैयार करने को कहा। पहली स्थिति यह कि दुनिया के 50 सबसे अमीर देश कोरोना वैक्सीन के पहले 2 अरब डोज पर अपना एकाधिकार कर लें और दूसरी स्थिति यह कि दुनिया भर में वैक्सीन का वितरण विभिन्न देशों की पूंजी को नहीं बल्कि उनकी आबादी को ध्यान में रखकर किया जाए।

बंटे कैसे वैक्सीन
मॉब्स लैब टीम कई वर्षों से दुनिया भर में इन्फ्लुएंजा के फैलाव को मॉडल बना रही है। इस बार उसके सामने इस बीमारी के उन असंख्य अनजाने पहलुओं को ध्यान में रखने की चुनौती थी, जो भविष्य में सामने आ सकते हैं। इस संबंध में कोई ऐतिहासिक नमूना भी मौजूद नहीं है, जिसके आधार पर कोई आकलन किया जा सके। इसीलिए मॉब्स लैब की टीम ने इस कल्पना को आधार बनाकर यह मॉडल तैयार किया कि क्या होता अगर मार्च महीने के बीच में ही इस महामारी की वैक्सीन उपलब्ध हो जाती। यहां एक वास्तविक वैक्सीन के बिना ही उन्हें कुछ पूर्वानुमान करने थे। खासतौर पर यह कि किसी व्यक्ति को वैक्सीन का एक डोज देने के दो हफ्ते बाद यह 80% तक प्रभावी रहेगी और यह कि 12.5 करोड़ डोज हर हफ्ते दिए जा सकेंगे। निष्कर्ष यह रहा कि निष्पक्ष स्थिति में वैक्सीन ने 1 सितंबर तक 61% लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया होता।

रोम की एक लैब में काम पर लगे टेक्निकल स्टाफ

लेकिन ऐसी स्थिति में, जहां दुनिया के अमीर देश सारी वैक्सीन अपने पास ही जमा कर लेते, इस महामारी से होने वाली मौत का आंकड़ा लगभग दोगुना होता और अगले चार महीने तक यह दुनिया के तीन चौथाई हिस्से में बेरोकटोक फैलती रहती। दुर्भाग्यवश, कुछ अमीर देशों के अब तक के रवैये को देखते हुए इस बात की संभावना ज्यादा है कि वे कोरोना वैक्सीन को पहले अपने ही यहां रोक कर रखेंगे। हम यह बात समझते हैं कि फार्मा कंपनियों के साथ वैक्सीन रिजर्व रखने के लिए सौदा करने को सरकारें क्यों आतुर हैं। अपने नागरिकों का स्वास्थ्य सुरक्षित रखना सरकारों की जिम्मेदारी है। उनमें निवेश करके वे रिसर्च और डिवेलपमेंट में तेजी ला सकती हैं। लेकिन हमें कुछ द्विपक्षीय सौदों को एक प्रभावी रणनीति मानने की गलती नहीं करनी चाहिए।

यह महामारी और आर्थिक मंदी पूरी दुनिया में है। अकेले राष्ट्रीय संसाधन इसका मुकाबला करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। देशों की सीमाएं रोगाणुओं के लिए कोई अहमियत नहीं रखतीं। उदाहरण के रूप में न्यूजीलैंड को ही ले लीजिए। यहां बीमारी को इस हद तक फैलने से रोक लिया गया कि खचाखच भरे रग्बी स्टेडियम समेत सारी गतिविधियां सामान्य रूप से शुरू हो गईं। लेकिन तब भी इस देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई और वायरस भी दोबारा आ गया। इस कारण यहां की सरकार पूरे न्यूजीलैंड में दोबारा शटडाउन करने को मजबूर हो गई।

बहरहाल, इसमें संदेह नहीं रह गया है कि कोविड-19 वैक्सीन का न्यायपूर्ण वितरण होगा तो इस महामारी से सभी को मुक्ति मिलेगी और हम इसमें जितना कम वक्त लगाएंगे उतना ज्यादा फायदे में रहेंगे। आईएमएफ के मुताबिक हम इस बीमारी के फैलाव से जितने महीने कम करेंगे, हर उस महीने में पूरी दुनिया में लगभग 500 अरब डॉलर की बचत होगी। अगर किसी देश में हर किसी को वैक्सीन लग जाए तो संभव है कि उसकी अर्थव्यवस्था कुछ बेहतर हो जाए, पर ऐसे देश दोबारा संपन्न हो जाएं, यह कभी नहीं होगा। खासकर तब, जब बाकी देशों में महामारी अपने पैर पसार रही है, ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह बिखरी हुई है और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर रोक जारी है।

तो एक प्रभावी और समानता भरा प्रयास कैसा होना चाहिए? हमारा फाउंडेशन उस प्रयास को समर्थन दे रहा है जिसके तहत, जाने-माने वैश्विक स्वास्थ्य संस्थानों को साथ लेकर रिसर्च, डिवेलपमेंट, उत्पादन के साथ डायग्नॉस्टिक टेस्ट, इलाज और वैक्सीन डिलीवर करने का काम किया जाता है। वे सभी देश, जो वह वैक्सीन निर्माण में अपना योगदान दे रहे हैं जिसे ‘कोवैक्स’ कहा जाता है, उन देशों को यह वैक्सीन उनकी जनसंख्या के अनुपात में उपलब्ध करवाने की गारंटी दी जाती है। यह उत्साहवर्धक है कि यूरोपियन कमिशन, साउथ कोरिया, जापान और कई अरब देशों ने कोवैक्स का समर्थन किया है। अंततः एक बहुपक्षीय समाधान के लिए मुहिम की शुरुआत हो गई है। लेकिन हम चाहेंगे कि अमीर देश भी ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस मुहिम से जुड़ें। जो देश कोवैक्स से नहीं जुड़ रहे, उन्हें किसी अन्य रूप में वैश्विक कोविड-19 रेस्पॉन्स में सहयोग करना चाहिए।

प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग
वे अपनी वैक्सीन के रिजर्व डोज में से कुछ हिस्सा गरीब देशों के लिए दे सकते हैं, जैसा कि H1N1 महामारी के समय कुछ देशों ने किया था। या फिर वे गवी को भी दान दे सकते हैं। गवी एक वैक्सीन अलायंस है, जो दो दशकों से भी ज्यादा समय से गरीब देशों में वैक्सीन पहुंचाने का काम कर रहा है। इस मुश्किल वक्त में फार्मा कंपनियों को भी चाहिए कि वे अपने उत्पादों की कीमत सभी के लिए सुलभ रखें। हमारा मानना है कि आगे चलकर पूरी दुनिया का इस दिशा में साथ मिलकर काम करना ही सबसे बेहतर उपाय साबित होगा। उद्योगों और सरकारों को समझने की जरूरत है कि यह कोई ऐसी प्रतिस्पर्धा नहीं जिसमें एक खिलाड़ी की जीत तभी होती है जब दूसरा हारता है। यह एक सहयोग आधारित प्रयास है, जिसमें हम सभी को साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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