सर्दियों में भी पिघल रहा है बर्फ का भंडार ग्रीनलैंड

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दुनिया का सबसे बड़ा टापू और उत्तरी गोलार्ध के बर्फ का भंडार ग्रीनलैंड तेजी से पिघल रहा है। बर्फ के पिघलने की रफ्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2019 में 53,200 करोड़ टन बर्फ पिघल कर समुद्र में मिल गई। वर्ष 1948 के बाद का यह सबसे बड़ा रेकॉर्ड है। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 21वीं सदी में पिछले 12 हजार वर्षों की तुलना में सबसे तेजी से बर्फ पिघलेगी। यह भी कहा जा रहा है कि ग्रीनलैंड का सारा बर्फ पिघल गया तो समुद्र का जल स्तर किसी दो मंजिले मकान से भी ज्यादा ऊपर उठ जाएगा।

पहले गर्मी में बर्फ पिघलती थी तो सर्दियों में जम भी जाती थी, मगर अब ग्रीनलैंड में ऐसा नहीं हो रहा है। अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों को यह पता चला है कि ग्रीनलैंड के तीन ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इनमें से दो पश्चिमी क्षेत्र में और एक पूर्वी क्षेत्र में है। इसकी वजह से वर्ष 1980 से 2012 के दौरान समुद्र तल में 8.1 मिमी की वृद्धि हुई। इसके बाद के वर्षों में पता चला कि तीनों ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का स्तर 20 सेमी तक ऊपर उठ गया है। पिछले दो दशकों में बर्फ जिस तेजी से पिघल रही है, ऐसे ही पिघलती रही तो अगले 100 सालों में लगभग 6 लाख करोड़ टन बर्फ पिघल कर समुद्र में मिल जाएगी। हालांकि बर्फ के पिघलने की दर एक जैसी नहीं है। यह लगातार तेज ही होती जा रही है।

ग्रीनलैंड अटलांटिक और आर्कटिक महासागरों के बीच बसा एक द्वीपीय देश है। यह लगभग 21 लाख 66 हजार किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जिसके लगभग 80 प्रतिशत हिस्से में बर्फ ही बर्फ है। हालांकि यह तकनीकी रूप से उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप का एक हिस्सा है, पर ऐतिहासिक रूप से यह डेनमार्क और नॉर्वे जैसे यूरोपीय देशों के साथ जुड़ा हुआ है। आज ग्रीनलैंड को डेनमार्क के भीतर एक स्वतंत्र क्षेत्र माना जाता है। तटवर्ती इलाकों में जहां बर्फ नहीं है, वहां पर आबादी बसी हुई है। वर्ष 2018 के एक आंकड़े के मुताबिक, तब इसकी आबादी 57,651 थी। यहां के लोग मुख्य रूप से मछली पर निर्भर हैं। मछली एक्सपोर्ट भी की जाती है। जब धूप खिलती है तो यहां का नजारा सतरंगी हो जाता है। वह समय यहां के लोगों के लिए उत्सव जैसा होता है। यहां पर दो महीने धूप खिलती है।

कुछ साल पहले एक रिपोर्ट में माना गया कि समुद्र में जलस्तर बढ़ने के तीन मुख्य कारण हैं। लगातार तापमान बढ़ने से समुद्र का पानी अपने आप फैल रहा है, जिससे इसका जल स्तर ऊपर उठ रहा है। दूसरा कारण यह है कि पूरी दुनिया में काफी अधिक मात्रा में जमीन के अंदर का पानी पंप से खींचकर निकाला जा रहा है। तीसरा कारण है ग्लेशियरों का पिघलना। समुद्र का जल स्तर बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी भूमिका ग्लेशियरों के पिघलने की ही है। ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग से पिघल रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविदों की चिंता है कि ऐसे ही चलता रहा तो 21वीं सदी के अंत तक औसत तापमान 3.7 डिग्री सेल्सियस हो सकता है। पेरिस समझौते के तहत दुनिया का दीर्घकालीन औसत तापमान डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस तक रखने का टारगेट रखा गया है।

ग्लेशियरों का पिघलना यूं ही जारी रहा तो अगले 100 वर्षों में दुनिया के बंदरगाह वाले 293 शहर डूब जाएंगे, जिनमें भारत के मंगलोर, मुंबई, कोलकाता, आंध्र प्रदेश के काकीनाडा भी हैं। भारत की बनावट के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि समुद्र का स्तर 1 मीटर तक ऊपर उठता है तो यहां के तटवर्ती इलाकों का 14,000 वर्ग किमी में फैला इलाका तबाह हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2050 तक लगभग 4 करोड़ लोगों को समुद्र के बढ़ते जल स्तर का सामना करना होगा। मुंबई और कोलकाता पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि यहां की आबादी घनी है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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