सिर्फ 12 साल प्रजातंत्र के बाद नेपाल में अब क्यों उठने लगी 240 साल पुरानी ‘हिंदू’ राजशाही की मांग?

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नेपाल की सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) में कलह लंबे वक्त से चलती आ रही है। अभी तक पार्टी के को-चेयर पुष्प कमल दहल प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग करते आ रहे थे, अब देश में अलग ही मांग जोर पकड़ने लगी है। नेपाल में इस हफ्ते पोखरा और बुटवाल जैसे बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है जहां मांग की जा रही है प्रजातंत्र को खत्म करने की। इन लोगों की मांग है कि दुनिया की आखिरी हिंदू राजशाही को वापस लाया जाए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि 12 साल में ही देश वापस सदियों पुरानी परंपरा अपनाना चाहता है, इस पर डालते हैं एक नजर-

तेज हो रहे आंदोलन

इन दिनों देश के कई शहरों में फेडरल डेमोक्रैटिक रिपब्लिकन सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं जिसे नेपाल में 2008 में लागू किया गया था। इसे 240 साल से चल रही राजशाही खत्म करने के बाद लागू किया गया था। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व तभी से किया है। हालांकि, इस बार हालात अलग हैं। पहले जहां इस आंदोलन के कुछ ही समर्थक होते थे ,अब युवा इसमें बड़ी संख्या में कूद पड़े हैं। नेपाल के पूर्व राजा और हिंदू राजशाही के समर्थन में नारे लग रहे हैं जिनके आज राजनीतिक बयान देने पर नेता आलोचना करने उतर पड़ते हैं।

एक-दूसरे से भिड़ने में लगे नेता

अब नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ऐसे प्रदर्शनों को खारिज करते आए हैं और इनके पीछे साजिश को जिम्मेदार बताते रहे हैं। myrepublica की रिपोर्ट के मुताबिक राजशाही की मांग में प्रदर्शन बढ़ रहे हैं क्योंकि आम लोग प्रजातांत्रिक व्यवस्था से नाराज हो चुके हैं। लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश है कि पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ लड़कर सत्ता हासिल करने और अंदरूनी कलह सुलझाने में ही व्यवस्त रहती हैं। केपी शर्मा ओली की सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रह है। जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार से अब लोग त्रस्त आ चुके हैं। लोगों का मानना है कि किसी भी राजा के समय से बदतर हालात इस वक्त सरकार के शासन में हैं।

अब भी बदतर हैं हालात

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक लोग राजशाही को बहुत ज्यादा पसंद नहीं करते हैं लेकिन फिर भी लोग इसका समर्थन कर रहे हैं। दरअसल, साल 2008 के बाद सरकारें लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं। जो बुराइयां पहले थीं, वे अभी भी बरकरार हैं। नेपाल अब भी दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में से एक है और यहां भ्रष्टाचारियों को सजा देने का प्रभावशाली तरीका नहीं है। नेपाल के लोग साल 2007 में राजशाही के खिलाफ खड़े हो गए और आखिरकार इसे इतिहास के नाम कर दिया। अब 13 साल बाद नेपाल के लोग उसे वापस लाने की मांग कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि कि राजनीतिक दल किस हद तक सरकार चलाने में नाकाम रहे हैं। वह संविधान के मुताबिक केंद्रीय लोकतांत्रिक सरकार चलाने में नाकामयाब रहे हैं।

आखिर क्यों गई ज्ञानेंद्र की ताकत?

पूर्व राजा ज्ञानेंद्र जब भी राजनीतिक बयान देते हैं, राजनीतिक दल उनके खिलाफ उतर आते हैं। ऐसा करने में वे लोगों की निगाहों में अखरने भी लगते हैं। नेपाल के राजा ज्ञानेंद्र 1769 से चली आ रही राजशाही को संभाल रहे थे। वह 2001 में तब सत्ता में आए थे जब उनके बड़े भाई और राजपरिवार की हत्या कर दी गई थी। चार साल बाद ज्ञानेंद्र ने संसद को खत्म कर दिया और पूरी तरह से सत्ता पर काबिज हो गए। उन्होंने दावा किया कि वह देश के हालात सुधार देंगे लेकिन उनका ये कदम उल्टा पड़ गया और राजशाही के खिलाफ आंदोलन होने लगे। नेपाल में एक दशक तक चले आंदोलन के बाद माओवादियों ने साल 2006 में अंतरिम सरकार का हिस्सा बनना स्वीकार किया था लेकिन बाद में राजशाही को पूरी तरह से खत्म करने की मांग की।

2008 में खत्म हुई राजशाही

2008-

28 मई 2008 को नेपाल में राजशाही पूर्ण रूप से खत्म हो गई थी। तब सभी पार्टियों को मिलाकर गठित संविधान सभा को देश का एक नया संविधान बनाने का काम सौंपा गया था। नेपाली राजनीतिक दलों को संविधान का मसौदा तैयार करने में सात साल लगे। 2017 के चुनावों ने तत्कालीन सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन (माओवादी दलों) के कम्युनिस्ट गठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिला। बाद में इन सभी दलों ने मिलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल नाम की एक नई पार्टी बनाई। जो वर्तमान में देश पर शासन कर रही है।



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