15 साल पहले पासवान के दिए ‘राजनीतिक जख्म’ से आज भी कराह जाते हैं नीतीश, तभी दोनों के बीच है ’36 का आंकड़ा’!

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पटना
लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग होकर अपने दम पर बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला लिया है। एलजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में रविवार को यह फैसला लिया गया। हालांकि पार्टी का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से उसकी कोई कटुता नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नेतृत्व उसे मंजूर नहीं है। एलजेपी ने यह भी ऐलान कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने पर जीत हासिल करने वाले एलजेपी विधायक बीजेपी के ही साथ मिलकर प्रदेश में सरकार बनाएंगे। एलजेपी की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि विधानसभा चुनाव में राज्य स्तर पर गठबंधन में शामिल जनता दल-युनाइटेड (जेडीयू) से वैचारिक मतभेद के कारण पार्टी ने गठबंधन से अलग चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। जेडीयू को लेकर एलजेपी की ओर से कही गई बात के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या वजह है कि दोनों पार्टियां एक-दूसरे को पसंद नहीं करती हैं। सोमवार की सुबह लोगों के हाथ में अखबार पहुंचने के बाद बिहार के लगभग हर चाय दुकान पर यही चर्चा होती रही कि आखिर चिराग पासवान और नीतीश कुमार में क्यों है ’36 का आंकड़ा’?

2005 से पासवान और नीतीश में है टशन
साल 2005 के फरवरी-मार्च में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे। इस चुनाव से ठीक पहले रामविलास पासवान ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी लोकजनशक्ति बना ली थी और चुनाव में अकेले उतर गए थे। उस दौरान नीतीश कुमार और बीजेपी मिलकर लालू फैमिली की सरकार उखाड़ने की मुहिम में जुटे थे। नीतीश कुमार चाहते थे कि रामविलास पासवान उनके साथ रहें ताकि इस मुहिम को बल मिले, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। रामविलास पासवान अलग हो गए और अकेले चुनाव मैदान में उतरे।

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चुनाव रिजल्ट आने के बाद बिहार की जनता ने सत्ता की चाभी रामविलास पासवान को सौंप दी थी। उनकी पार्टी एलजेपी को 29 सीटें आई थीं। नीतीश कुमार ने एक बार फिर रामविलास पासवान से अप्रोच किया कि वह उनके साथ आकर सरकार बनाएं और चलाएं। लेकिन रामविलास पासवान अपनी जिद्द पर अड़े रहे। रामविलास पासवान राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री की डिमांड पर ना नीतीश और ना लालू फैमिली को समर्थन दिया।

इसी बीच मीडिया में खबरें आईं कि रामविलास पासवान के करीब 23 विधायक टूटकर नीतीश कुमार को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। हालांकि नीतीश कुमार ने साफ तौर से मीडिया में कह दिया कि वह किसी किस्म की तोड़फोड़ करके सरकार नहीं बनाएंगे। नीतीश ने भले ही रामविलास पासवान की पार्टी के विधायकों को अपने साथ नहीं लिया, लेकिन उनकी पार्टी में तोड़फोड़ की हुई कोशिश से वह काफी आहत हुए। माना जाता है कि दोनों नेताओं के बीच टशन का दौर यहीं से शुरू हो गया।

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सरकार में आते ही नीतीश ने पासवान से लिया ‘बदला’
रामविलास पासवान की जिद्द के चलते बिहार में किसी भी दल की सरकार नहीं बन पाई, जिसके बाद 2005 अक्टूबर-नवंबर में मध्यावधि चुनाव हुए। बीजेपी+जेडीयू की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। एलजेपी बमुश्किल 10 सीटें जीत पाई। सरकार में आते ही नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान से हिसाब चुकता कर लिया। नीतीश सरकार ने बिहार में महादलित कैटेगरी बनाया, जिसमें लगभग हर दलित जातियों को शामिल किया गया, लेकिन पासवान जाति को बाहर रखा गया। बिहार में पासवान जाति की करीब पांच फीसदी आबादी है, जिन्होंने मार्च 2005 के चुनाव में भारी संख्या में रामविलास पासवान की पार्टी को सपोर्ट किया था। महादलित कैटेगरी बनाकर नीतीश कुमार ने गैर पासवान जातियों को अपने पाले में कर लिया। सरकार में ज्यादातर योजनाएं महादलितों के लिए लाए गए, जिससे पासवान दलित होने के बावजूद इसका लाभ नहीं ले पा रहे थे। इसके बाद 2016 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी के सााथ मिलकर दोबारा सरकार बनाई तो उसमें भी एलजेपी को शामिल नहीं किया। जबकि एलजेपी नीतीश सरकार में शामिल होने को इच्छुक थी। इस तरह नीतीश कुमार और राम विलास पासवान का झगड़ा बना रहा।

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रामविलास पासवान को CM नहीं बनने की है टीस
1960 के दशक में लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, रंजन यादव आदि सभी ने पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान से ही राजनीति में प्रवेश कर लिया था। जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन के वक्त ये सभी चेहरे चर्चित हो गए और आज तक बिहार की सत्ता के केंद्रबिंदु बने हुए हैं। इन चेहरों में लालू और नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे। सुशील कुमार मोदी भी करीब 13 साल से बिहार के डिप्युटी चीफ मिनिस्टर हैं। रंजन यादव को लालू यादव ने पहले ही किनारे कर दिया है। बाकी बचे रामविलास पासवान, वह केंद्र में 1996 से लगातार (2009-2014 को छोड़कर) अलग-अलग सरकारों में मंत्री हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए हैं। रामविलास पासवान को जानने-समझने वाले कहते हैं कि उन्हें इस बात का मलाल है कि वह बिहार के की राजनीति में सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए।

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नीतीश ने पासवान के दलित+मुस्लिम फॉर्म्युले को किया तहस-नहस
रामविलास पासवान बिहार में मुख्यमंत्री बनने की चाहत में दलित+मुस्लिम का फॉर्म्युला बनाना चाहते, लेकिन यह नीतीश कुमार की वजह से अब तक मंसूबा ही रह गया है। पहले कुल 16 फीसदी दलितों में नीतीश ने करीब 11 फीसदी लोगों को महादलित कैटेगरी में डाल दिया। इस वजह से महादलित जातियां नीतीश के साथ खड़ी दिखने लगी हैं। वहीं नीतीश कुमार बीजेपी से दोस्ती रखने के साथ ही कई मुद्दों पर उनकी मुखालफत करके मुस्लिमों का भी अच्छा खासा वोट खींच ले जाते हैं। इस वजह से रामविलास पासवान चाहकर भी बिहार में दलित+मुस्लिम गठजोड़ नहीं कर पाए हैं। 2009 के लोकसभा और 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान ने लालू यादव के साथ मिलकर इस फॉर्म्युले को आजमाने की कोशिश की, लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। अब रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान फिर से उसी कोशिश में हैं कि वह नीतीश कुमार से समानांतर बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर पाएं। हालांकि यह तो 10 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही साफ हो पाएगा कि पासवान फैमिला के दांव को जनता स्वीकारती है या नहीं।



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