1944 में आज ही के दिन 800 बच्चों को गैस चेंबर में डालकर की गई थी हत्या

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नई दिल्ली
आज का दिन इतिहास के पन्नों में हमेशा काली स्याही से दर्ज किया जाएगा। आज ही के दिन 10 अक्टूबर 1944 को 800 रोमानी बच्चों की हत्या कर दी गई थी। इनमें से 100 तो ऐसे बच्चे थे जिनकी उम्र 9 से 14 साल के बीच थी। हिटलर की हैवानियत तो सबको पता है लेकिन कम ही लोग इस घटना के बारे में जानते होंगे।

पोलैंड का ऑश्वित्ज़
हिटलर की हैवानियत का सबसे बड़ा सेंटर था, पोलैंड का ऑश्वित्ज़। ये नाजी हुकूमत का सबसे बड़ा कंसंट्रेशन कैंप यानी नजरबंदी शिविर था। नाजी खुफिया एजेंसी एसएस यहां पर यूरोप भर से यहूदियों को पकड़कर ले आती थी। इनमें से कई लोगों को तो कैंप पहुंचते ही गैस चैम्बर में डालकर मार डाला जाता था। वहीं बहुत से ऐसे भी थे जिन्हें मौत के लिए महीनों तक घुट-घुटकर जीना होता था। उनके सिर के बाल साफ़ कर दिए जाते थे। कपड़े उतारकर चीथड़े पहना दिए जाते थे। फिर दिन रात काम लिया जाता था, और फिर उन्हे ज़िंदा रहने भर का खाना दिया जाता था।

कैसा था मौत का घर
ऑश्वित्ज़ वास्तव में एक शिविरों का समूह था, जिसे 1, 2, 3 ऐसा नाम दिया गया था। यहां पर 40 छोटे सैटेलाइट कैंप भी थे। इसको ऑश्वित्ज़ द्वितीय कहा जाता था और यह अक्टूबर 1941 को यह बिरकेनौ में स्थापित किया गया था। नाजी खुफिया एजेंसी एसएस ने यहां पर मौत का सारा इंतजाम कर रहा था। यहां पर भयानक से भयानक मौत देने के सभी तरीके अपनाए जाते थे। 300 जेल बैरक , चार बाथरूम, भट्टियां, लाश रखने का गोदाम सब उपलब्ध था। यहां पर हजारों कैदियों को चिकिस्कीय प्रयोग किए जाते थे। और ये सब करता था जोसेफ मेंजल जोकि इस कैंप का देखरेख करता था।

महिलाओं ने किया था विद्रोह
7 अक्टूबर 1944 को एक छोटा विद्रोह हुआ था। कई सौ यहूदी कैदियों की लाशों को निपटाने के लिए गैस चैंबरों से लेकर भट्ठी तक ले जाने के लिए मजबूर किया जा रहा था। यहूदियों ने एक गैस चैंबर को विस्फोटक का उपयोग कर उड़ा दिया और दूसरे में आग लगा दी। ये विस्फोटक यहूदी महिलाओं से तस्करी करवाया गया जो पास के एक शस्त्रागार कारखाने में काम करती थीं।

मार दी गई गोली
तोड़फोड़ में शामिल लगभग 450 कैदियों में से लगभग 250 कैदी अराजकता के दौरान शिविर से भागने में सफल रहे। उन सभी को आगे घेर लिया गया और गोली मार दी गई। उन सह-साजिशकर्ताओं में उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया जिनका कोई दोष भी नहीं था। क्योंकि शस्त्रागार कारखाने में पांच महिलाएं थीं लेकिन तस्करी के संचालन के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए अत्याचार करने से पहले किसी भी महिला ने आपस में बात नहीं की थी।

मुआवजा भी नहीं मिला
हिटलर के शासनकाल में रोमानी लोगों पर क्रूर अत्याचार हुए। लगभग 1.5 मिलियन रोमानी लोगों की नाजियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। 1950 में जैसा कि रोमानी लोगों ने अपने लिए मुआवजा पाने का प्रयास किया,लेकिन यहां भी उनको कोई सहारा नहीं मिला। जर्मन सरकार ने उन्हें कुछ भी कहने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्हें नाजियों के तहत किसी नस्लीय कारण से नहीं बल्कि एक सनकी और आपराधिक रेकॉर्ड होने के कारण सताया गया। उन पर हुए अत्याचारों के प्रकाश में भी उन्हें कलंकित किया गया।



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