Monsoon Session 2020 : प्रश्नकाल नहीं, कोविड के मद्देनजर विशेष व्यवस्था, संसद के मॉनसून सत्र में बहुत कुछ पहली बार

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राकेश मोहन चतुर्वेदी, नई दिल्ली
संसद के मॉनसून सत्र को ‘पहली बार हुईं बहुत सी बातों’ के लिए याद किया जाएगा। इनमें कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विशेष व्यवस्था से लेकर प्रश्नकाल की छुट्टी और राज्यसभा में हंगामे को लेकर आठ सांसदों का निलंबन तक, कई ऐसी बातें शामिल हैं। सत्र के दौरान सोशल डिस्टैंसिंग की विशेष व्यवस्था की गई थी। इस कारण, स्वतंत्रता के बाद से पहली बार दोनों सदनों के सदस्य विजिटर्स गैलरी और एक-दूसरे सदन के चैंबर में भी बैठे।

तीसरा सबसे छोटा सत्र

राज्यसभा से मिली जानकारी के मुताबिक, 2020 का मॉनसून सत्र संसद का दूसरा सबसे छोटा मॉनसून सत्र रहा। इस सत्र में 1 अक्टूबर तक 18 बैठकें होनी थीं, लेकिन सांसदों से लेकर संसद के कर्मचारियों में बढ़ते कोरोना संक्रमण के मामलों के कारण इसे एक सप्ताह पहले 23 सितंबर को ही खत्म करना पड़ा। यह मॉनसून सत्र 1952 से अब तक का तीसरा सबसे छोटा सत्र था। जुलाई 1979 और अक्टूबर 1999 में मॉनसून सत्र छह दिनों का था।

रविवार को भी चला सत्र

1974 में सबसे लंबा मॉनूसन सत्र आयोजित हुआ था जिसमें जुलाई से सितंबर के बीच 40 बैठकें हुई थीं। इस बार रविवार को भी संसद की बैठकें हुईं। ऐसा बहुत कम ही हुआ है। हालांकि, संसद सत्र सिर्फ 10 दिनों के लिए ही हुआ, लेकिन सरकार ने इस दौरान छह नए विधेयकों समेत कुल 25 विधेयक पास करवा लिए। विपक्ष ने विधेयकों के धड़ाधड़ पास करवाए जाने के खिलाफ अपना गुस्सा जमकर निकाला क्योंकि उनकी मांग के मुताबिक बिलों को स्टैंडिंग कमिटी के पास नहीं भेजा गया।

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प्रश्ननकाल नहीं, शून्यकाल के समय में कटौती


इस बार का संसद सत्र प्रश्नकाल नहीं होने को लेकर भी खूब चर्चा में रहा। केंद्र सरकार ने संसद में उठे सवालों के सिर्फ लिखित जवाब ही दिए। राज्यसभा में केंद्र ने 1,567 सवालों के लिखित उत्तर दिए। विपक्ष ने प्रश्नकाल नहीं रखने पर केंद्र को निशाने पर लिया और कहा कि सरकार पारदर्शिता से भाग रही है। शून्य काल में संसद सदस्य तात्कालिक महत्व के मुद्दे उठाते हैं जिसे एक घंटे से घटाकर आधा घंटा कर दिया गया। हालांकि, केंद्र सरकार ने कहा कि प्रश्नकाल हटाने और शून्यकाल कम करने के पीछे मूल कारण समय का अभाव है।

विपक्ष ने तार-तार कर दीं मर्यादाएं

विपक्ष ने भले ही इन परिवर्तनों को लेकर हो-हंगामा किया हो, लेकिन 20 सितंबर को कृषि विधेयकों को पेश किया गया तो राज्यसभा में उसका अलग ही रूप देखने को मिला। सदन के उपसभापति हरिवंश ने दोनों विधेयकों को स्टैंडिंग कमिटी के पास भेजने के प्रस्ताव पर मतदान करवाने का आग्रह खारिज कर दिया तो विपक्ष ने सभी नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। विपक्षी सदस्यों ने रूल बुक फाड़े, उपसभापति का माइक तोड़ दिया, राज्यसभा सचिवालय स्टाफ के टेबल पर चढ़ गए और मार्शलों के साथ बदसलूकी की।

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पहली बार उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

इतिहास में पहली बार विपक्ष ने राज्यसभा के उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया। सभापति एम. वेंकैया नायडू ने इसे ‘अप्रत्याशित घटना’ बताते हुए गहरी नाराजगी प्रकट की। उन्होंने इस प्रस्ताव को तनकीकी दृष्टि से अवैध करार दिया क्योंकि ऐसे प्रस्ताव को लाने से 14 दिन पहले नोटिस देने का प्रावधान है जो इतने छोटे सत्र में संभव नहीं था। बहरहाल, विपक्ष ने आठ राज्यसभा सांसदों के निलंबन के बाद आखिरी दो बैठकों का बहिष्कार कर दिया। सरकार ने सदन में विपक्षी का गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर मंगलवार को सात और अगले दिन बुधवार को चार विधेयक पास करवा लिए।

अकाली दल ने छोड़ी सरकार

इस सत्र की एक और बड़ी बात यह रही कि पूरे सत्र में एक भी उपनियमों या संशोधनों पर वोटिंग नहीं हुई। कृषि विधेयकों के कारण एनडीए के पुराने सहयोगियों में एक शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने भी सरकार का साथ छोड़ दिया। इस सत्र में विपक्ष सिर्फ देश में कोविड-19 महामारी की स्थिति पर ही विस्तार से चर्चा कर सका। पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी तनाव पर बहुत चर्चा नहीं हुई क्योंकि यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में इस मुद्दे पर बयान दिया और ऊपरी सदन राज्यसभा में कुछ सवालों के जवाब दिए।



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