Plasma Therapy in Coronavirus : ICMR का बड़ा खुलासा, इससे नहीं टलता मौत का खतरा

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हाइलाइट्स:

  • ICMR की स्‍टडी में खुलासा, प्‍लाज्‍मा थेरेपी से मौत का खतरा नहीं टलता
  • भारत में प्‍लाज्‍मा थेरेपी से इलाज की इजाजत, असर पर की गई रिसर्च
  • 28 दिन के भीतर ट्रायल में प्‍लाज्‍मा ट्रीटमेंट और नॉर्मल इलाज में अंतर नहीं मिला
  • कोविड-19 के गंभीर मरीजों के इलाज में कारगर नहीं है यह थेरेपी

नई दिल्‍ली
कॉन्वलसेंट प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना वायरस के गंभीर मरीजों के इलाज में कोई खास मदद नहीं मिलती। साथ ही यह थेरेपी मृत्‍यु दर कम करने में भी कारगर साबित नहीं हो रही। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की एक रिसर्च में यह बात सामने आई है। कोरोना मरीजों पर प्‍लाज्‍मा थेरेपी का असर जानने के लिए देशभर के 39 निजी और सरकारी अस्पतालों 22 अप्रैल से 14 जुलाई के बीच ट्रायल हुआ था। नतीजे बताते हैं कि 28 दिन के समय में प्‍लाज्‍मा थेरेपी पाने वाले मरीजों और आम इलाज पा रहे मरीजों की हालत में कोई अंतर नहीं पाया गया।

जिन देशों ने रिसर्च की, इलाज बंद कर दिया
ICMR ने ‘ओपन-लेबल पैरलल-आर्म फेज 2 मल्टीसेन्टर रेंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल’ (PLACID ट्रायल) में कुल 464 मरीजों पर प्‍लाज्‍मा थेरेपी के असर की जांच की। MedRxiv में छपी स्‍टडी के अनुसार, “कॉन्वलसेंट प्लाज्मा मृत्यु दर को कम करने और कोविड-19 के गंभीर मरीजों के इलाज करने में कोई खास कारगर नहीं है।” ICMR की रिसर्च यह भी कहती है कि कॉन्वलसेंट प्लाज्मा के इस्‍तेमाल को लेकर दो ही स्‍टडी छपी हैं, एक चीन और दूसरी नीदरलैंड से। दोनों ही देशों में इस थेरेपी को बंद कर दिया था।

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मृत्‍यु दर पर ज्‍यादा असर नहीं
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 27 जून को जारी किए गए कोविड-19 के ‘क्लिनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल’ में इस थेरेपी के इस्तेमाल को मंजूरी दी थी। इस थेरेपी में कोविड-19 से उबर चुके व्यक्ति के रक्त से ऐंटीबॉडीज लेकर उसे संक्रमित व्यक्ति में चढ़ाया जाता है, ताकि उसके शरीर में संक्रमण से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सके। ICMR ने पाया कि दोनों तरह के मरीजों (प्‍लाज्‍मा थेरेपी और सामान्‍य इलाज) की मृत्‍यु दर में फर्क बेहद कम (1%) था।

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प्‍लाज्‍मा क्‍या होता है?
शरीर में मौजूद खून के कई हिस्‍से होते हैं। आरबीसी, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट्स के अलावा अन्य सभी द्रव्य सामग्री को प्लाज्मा कहा जाता है। मानव शरीर के ब्लड में करीबन 55 प्रतिशत से अधिक प्लाज्मा होता है। प्लाज्मा में पानी के अलावा हार्मोंस, प्रोटीन, कार्बन डाइऑक्साइड और ग्लूकोस मिनरल पाए जाते हैं। ब्लड में हिमोग्लोबिन और आयरन की वजह से खून लाल होता है लेकिन यदि प्लाज्मा को ब्लड से अलग कर दिया जाए तो यह हल्का पीला तरल बन जाता है। प्लाज्मा का काम हार्मोन, प्रोटीन और पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ले जाना है। जब बॉडी में किसी भी तरह का वायरस या बैक्टीरिया अटैक करता है तो हमारी बॉडी उससे लड़ना शुरू कर देती है जिसके बाद बॉडी में ऐंटीबॉडी बनती है और फिर ऐंटीबॉडी उस बीमारी के खिलाफ लड़ाई लड़ता है।

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प्‍लाज्‍मा थेरेपी से कोरोना का इलाज कैसे?
एम्स के लैब मेडिसिन डिपार्टमेंट में एमडी डॉ़ राजीव रंजन बताते हैं कि जो लोग कोरोना वायरस से ठीक हो चुके हैं, उनमें कोरोना वायरस के खिलाफ ऐंटीबॉडी तैयार हो जाती है। यह ऐंटीबॉडी वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम होती है। ऐसे में ठीक हो चुके मरीजों के प्लाज्मा को कोविड पेशेंट में ट्रांसफ्यूज किया जाता है। ठीक हो चुके मरीज से जब प्लाज्मा थैरेपी के जरिए ऐंटीबॉडी कोविड मरीज की बॉडी में डाली जाती है तो वायरस का असर कम होने लगता है। इस पूरी प्रक्रिया को प्लाज्मा थेरेपी कहा जाता है। कोरोना से ठीक हो चुके एक व्यक्ति के प्लाज्मा को दो कोविड पेशेंट में ट्रांसफ्यूज किया जा सकता है।



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